जब तक तुम्हे यह खत मिलेगा,
मैं दूर मंजिल की ओर जा चुका होऊंगा।
सुखदेव के नाम पत्र
प्रिय भाई,
जब तक तुम्हें यह पत्र मिलेगा, मैं दूर मंजिल की ओर जा चुका होऊंगा। मेरा यकीन करना, आजकल मैं बहुत प्रसन्नचित अपने आखिरी सफर के लिए तैयार हूँ। अपनी जिन्दगी की सारी खुशियो और मधुर यादों के बावजूद मेरे दिल मे आजतक एक बात चुभती रही। वह यह कि मेरे ने मुझे गलत समझा और मुझ पर कमजोरी का बहुत ही गम्भीर आरोप लगाया। आज मैं पहले से कही ज्यादा पूरी तरह से संतुष्ट हूँ। मैं आज भी महसूस करता हूँ कि वह बात कुछ भी नही, बस गलतफहमी थी। गलत शक था, मेरे खुले व्यवहार के कारण मुझे बातूनी समझा गया और मेरे द्वारा सबकुछ स्वीकार कर लेने को कमजोरी माना गया। लेकिन आज मैं महसूस कर रहा हूँ कि कोई गलतफहमी नही, मैं कमजोर नही, अपनो में से किसी से भी कमजोर नही।
भाई मेरे, मैं साफ दिल से विदा लूँगा और तुम्हारी शंका भी दूर करूँगा। इसमे तुम्हारी बहुत कृपालुता होगी। ध्यान रहें, तुम्हे जल्दबाजी में कोई कदम नही उठाना चाहिए। सोच- समझकर और शान्ति से काम को आगे बढ़ाना चाहिए। अवसर पा लेने की जल्दबाजी ना करना। जनता के प्रति जो तुम्हारा फर्ज है उसे निभाते हुए सावधानीपूर्वक करते रहना। सलाह के तौर पर मैं कहना चाहता हूँ कि शास्त्री मुझे पहले से ही अधिक अच्छा लग रहा है। मैं उसे सामने लाने की कोशिश करता हूँ, बशर्ते की वह अपनी साफगोई से अपने आपको एक अंधेरे भविष्य के लिए अर्पित करने के लिए सहमत हो। उसे साथियों के नजदीक आने दो ताकि वह अपने आचार- विचार का अध्ययन कर सकें। यदि वह अर्पित भाव से काम करेगा तो काफी लाभदायक और मूल्यवान साबित होगा। लेकिन जल्दबाजी न करना। तुम खुद एक अच्छे पारखी हो। जिस तरह जँचे, देख लेना। आ मेरे भाई, अब हम खुशियां मना सकें।
खैर, मैं कह सकता हूँ कि बहस के मामले में मुझसे अपने पक्ष पेश किए बिना नही रह जाता। मैं पुरजोर कहता हूँ कि मैं आशाओं और आकांक्षाओं से भरपूर जीवन की समस्त रंगीनियों से ओतप्रोत हूँ, लेकिन वक्त आने पर मैं सब कुछ कुर्बान कर दूँगा। सही अर्थों में यही बलिदान है। यह वस्तुएँ मनुष्य की राह में कभी भी अवरोध नही बन सकती, बशर्ते कि वह इंसान हो। जल्द ही तुम्हे इसका प्रमाण मिल जाएगा। किसी के चरित्र के सन्दर्भ में विचार करते समय एक बात विचारणीय होनी चाहिए कि क्या प्यार किसी इनसान के लिए मददगार साबित हुआ है? इसका जवाब आज मैं देता हूँ - हाँ, वह मेजिनी था। तुमने अवश्य पढ़ा होगा कि अपने पहले नाकाम विद्रोह, मन को कुचल डालनेवाली हार का दुख और दिवंगत साथियों की याद- यह सब वह बर्दास्त नही कर सकता था। वह पागल हो जाता या खुदकुशी कर लेता। लेकिन, प्रेमिका के एक पत्र से वह दुसरो जितना ही नही, बल्कि वह सबसे अधिक मजबूत हो गया।
जहाँ तक प्यार के नैतिक स्तर का संबंध है, मैं यह कह सकता हूँ कि यह अपने में एक भावना से अधिक कुछ भी नही और यह पशुवृत्ति नही बल्कि मधुर मानवीय भावना है। प्यार सदैव मनवीयचरित्र को ऊचां करता है, कभी भी नीचा नही दिखता, बशर्ते कि वह प्यार प्यार हो। इन लड़कियों (प्रेमिकाओं) को कभी भी पागल नही कहा जा सकता जैसा कि हम फिल्मों में देखते हैं- वे सदैव पाशविक वृत्ति के हाथों में खेलती हैं। सच्चा प्यार कभी भी सृजित नही किया जा सकता। यह अपने आप ही आता है- कब, कोई कह नही सकता?
मैं यह कह सकता हूँ कि नौजवान युवक- युवती आपस मे प्यार कर सकते है और वे अपने प्यार के सहारे अपने आवेगों से ऊपर उठ सकते है। अपनी पवित्रता कायम रखें रह सकते है। मैं यहाँ स्पष्ट कर देना चाहता हूँ कि जब मैंने प्यार को मानवीय कहा था तो यह किसी सामान्य व्यक्ति को लेकर नही कहा था, जहाँ तक कि बौद्विक स्तर पर सामान्य व्यक्ति होते है पर वह सबसे ऊँचे आदर्श स्थिति होगी जब मनुष्य प्यार, घृणा और अन्य सभी भावनाओ पर नियंत्रण पा लेगा। जब मनुष्य कर्म के आधार पर अपना पक्ष अपनाएगा। एक व्यक्ति कि दूसरे व्यक्ति से प्यार की निंदा की है, वह भी एक आदर्श स्थिति होने पर। मनुष्य के पास प्यार कि एक गहरी भावना होनी चाहिए जिसे वह एक व्यक्ति विशेष तक सीमित न करके सर्वव्यापी बना दें।
मेरे विचार से मैंने अपने पक्ष को काफी स्पष्ट कर दिया है। हाँ, एक बात मैं तुम्हे खासतौर पर बताना चाहता हूँ कि बावजूद क्रांतिकारी विचारों के हम नैतिकता सम्बन्धी सभी सामाजिक धारणाओं को नही अपना सकें। क्रांतिकारी बातें करके इस कमजोरी को बहुत सरलता से छिपाया जा सकता है, लेकिन वास्तविक जीवन में हम तुरंत ही थर- थर काँपना शुरू कर देते है।
मैं तुमसे अर्ज करूँगा कि तुम यह कमजोरी त्याग दो। अपने मन मे बिना कोई गलत भावना लाए अत्यंत नम्रतापूर्वक क्या मैं तुमसे आग्रह कर सकता हूँ कि तुमसे जो अति आदर्शवाद है उसे थोड़ा- सा कम कर दो। जो पीछे रहेंगे और मेरी- जैसी बीमारी का शिकार होंगे, उनसे बेरुखी व्यवहार न करना, झिड़ककर उनके दुख-दर्दो को न बढ़ाना , क्योकि उनको तुम्हारी हमदर्दी की जरूरत है। क्या मैं यह आशा रखूँ कि तुम किसी विशेष व्यक्ति के प्रति खुन्दक रखने के बजाय उनसे हमदर्दी रखोगे, उनको इसकी बहुत जरूरत है। तुम तब तक इन बातों को नही समझ सकते जब तक कि खुद इस चीज का शिकार न बनों। लेकिन मैं यह सबकुछ क्यो लिख रहा हूँ? दरअसल मैं अपनी बातें स्पष्ट तौर पर कहना चाहता हूँ। मैंने अपना दिल खोल दिया है।
तुम्हारी सफलताओ और जीवन के लिए शुभकामनाओ के साथ।।।
तुम्हारा,
भगत सिंह
(राजकमल प्रकाशन के ब्लॉग से)
