शुक्रवार, 1 फ़रवरी 2019

गांधी के नाम पत्र!

मान्यवर महात्मा

  'किस्सा सुनते हो रोज औरों के
  आज मेरी भी दास्तान सुनो'


 " आपने उस अनहोनी को प्रत्क्षय का कार्यरूप में परिणत कर दिखाया, जिसे टॉल्सटाय और महात्मा केवल विचारा करतें थे। उसी आशा और विश्वास के वशीभूत होकर हम आपके निकट अपनी राम कहानी सुनाने के लिए तैयार हैं। हमारी दुःख भरी कहानी दक्षिण अफ्रीका के अत्याचार से, जो आप और आपके अनुयायी वरी सत्याग्रही बहनों और भाइयों के साथ हुआ, कहीं अधिक है। हम अपना वह दुःख जो हमारी 19 लाख आत्माओं के हृदय पर बीत रहा है, सुनाकर आपके कोमल हृदय को दुखित करना उचित नहीं समझते हैं। बस केवल इतनी ही प्रार्थना है कि आप स्वयं आकर अपनी आँखों से देख लीजिए, तब आपको अच्छी तरह विश्वास हो जाएगा कि भारतवर्ष के एक कोने में यहाँ की प्रजा, जिसको ब्रिटिश छत्र की सुशीतल छाया में रहने का अभिमान प्राप्त है, किस प्रकार के कष्ट सहकर पशुवत जीवन व्यतीत कर रही है। हम और अधिक न लिखकर आपका ध्यान उस प्रतिज्ञा की ओर आकृष्ट करना चाहतें हैं, जो लखनऊ कांग्रेस के समय और फिर वहाँ से लौटते समय कानपुर में आपने की थी, अर्थात मार्च - अप्रैल महीने में चंपारण आऊँगा, बस अब समय आ गया है। श्रीमान अपनी प्रतिज्ञा को पूर्ण करें। चम्पारण की 19 लाख दुःखी प्रजा श्रीमान के चरण - कमल के दर्शन की टकटकी लगाए बैठी है। और उन्हें आशा ही नहीं पूर्ण विश्वास है कि जिस प्रकार भगवान श्री रामचन्द्र के चरण स्पर्श से अहिल्या तर गई, उसी प्रकार श्रीमान के चम्पारण में पैर रखते ही हम 19 लाख प्रजाओं का उद्धार हो जाएगा।"

बेतिया।                                       श्रीमान का दर्शनाभिलाषी
27 फरवरी, 1917                         राजकुमार शुक्ल


  यह वही पत्र था जिसे पढ़कर एमके गांधी ने चम्पारण जाने की अपनी योजना को तठस्थ और सुदृढ़ बना लिया। यह पत्र तो राजकुमार शुक्ल के नाम से लिखा गया था लेकिन यह पत्र "प्रताप" अखबार के पत्रकार पीर मोहम्मद मुनीस ने लिखा था। राजकुमार शुक्ल उतने पढ़े - लिखें नहीं थे जो एमके गांधी को इतना मार्मिक और आने के लिए विवश कर सकें। 

  और जब गांधी चम्पारण पहुँचे तो नील का दाग मिट गया। और यह हम सब जानते है। और यह साल तो गांधी की 150वीं जयंती है अक्टूबर 2 को। 

सूखते कपड़ो का छत!

छतों पर सूखते कपड़ो को देखकर ऐसा लगता है जैसे छत बनाये ही इसीलिए जाते हैं ताकि छतों पर कपड़े सुखाए जा सकें। जाड़ा के मौसम में तो भारत के लगभग स...