सोमवार, 14 अक्टूबर 2019

अर्नेस्टो गेवारा दे ला सरना


"घुटने टेककर ज़िंदगी जीने से बेहतर मैं मरना पसंद करूंगा"

अर्नेस्टो गुयेवारा लिंच और सेलिया दे ला सरना के घर पहला बेटा जन्म लिया, रोजारियो के सेन्टेनारियो के अस्पताल में। तारीख थी 14 जून 1928 और समय था शाम का 3:05। अपने माता-पिता के नाम पर ही अपना नाम रखा, 'अर्नेस्टो गेवारा दे ला सरना'। जो कई वर्षों बाद लैटिन अमेरिका के लिए एक नाम खटकने लगा। "चे"

   18 अक्टूबर, 1967 को शाम 8 बजे लाखों की तादाद में क्यूबा की जनता हवाना के उस क्रांति चौक पर जुटी जहाँ उसने न जाने कितनी बार चे की ओजस्वी वाणी को सुनते हुए उनका अभिवादन किया था। उस दिन वह धार-धार आँसू रोते, निःशब्द, साँस रोके फिदेल को सुन रही थी जो लैटिन अमेरिका जनता की आजादी और खुशहाली के लिए क्रांतिकारी मुक्ति - संघर्ष में चे के अकल्पनीय हठीले शौर्य और अविस्मरणीय शहादत की दास्तान सुना रहे थे। फिदेल ने वहाँ उपस्थित जन- समुद्र से, समूचे क्यूबा से, सम्पूर्ण मानवता से सवाल किया ' हम अपने बच्चों को क्या बनाएँगे ?' चारों दिशाओं से एक ही जवाब गूँजा - 'हम उन्हें चे बनाएँगे' - 'हम उन्हें चे बनाएँगे।' क्रांति के दीवाने नौजवानों का ध्येय वाक्य बन गया 'हम चे बनेंगे।'

   तभी पाब्लो नेरुदा की एक कविता बीच में आ जाती है

 मेरी छाती पर दस्तक देने मत आना, मैं दूर जा चुका हूँ।
 विचरो मेरे साम्राज्य में मनमर्जी से
मेरी गैर मौजूदगी में।
आलीशान विशाल घर है मेरी गैर मौजूदगी
टहलते रहो इसकी दीवारों के बीच
और टांगो पेंटिगें हवा में।
इतना पारदर्शी घर है गैर मौजूदगी
खुद के जीवन बिना ही देखूँगा तुम्हें जीते
अगर मैंने तुम्हें तकलीफ में देखा, मेरे प्रिय
मैं फिर-फिर मर जाऊँगा।

जब वह अपनी गर्लफ्रैंड चिचिना के माँ - बाप के साथ डिनर टेबल डिनर आंनद ले रहे थे तो बाकी लोग विश्वयुद्ध और विंस्टन चर्चिल की मेघा और क्षमता का दीवानगी की हद तक कायल थे। हर सदस्य के पास चर्चिल के गुणगान के लिए खुद को जोड़ते हुए कोई न कोई किस्सा था जिसे वे अपनी शान और भोजन, दोनों के स्वाद के चटकारे लेकर सुना रहे थे और सुनने वाले आह - वाह कर रहे थे, सिवाय मेरे। मैं बड़ी मुश्किल से खुद पर काबू रखते हुए अपने को खाने में उलझाए हुए था। आखिरकार मेरे सब्र का बाँध टूट ही गया। सर झुकाकर खाना खाते हुए मेरी छुरी जैसी धार वाली जबान चल ही गई, ' चर्चिल एक धूर्त धोखेबाज राजनीतिज्ञ के अलावा है क्या'। उस घर में मेरा वह अंतिम दिन था। मगर मैं और चिचिना उसके बाद छिप - छिपकर मिलते रहे।

चे कहते हैं कि भारत में ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन के बहरे कानों को सुनाने और ब्रिटिश राज में भारत की दुर्दशा के प्रति पूरी दुनिया का ध्यान दिलाने के लिए करीब एक दशक पहले शहीदे - आजम भगतसिंह ने भारतीय संसद के अंदर बम विस्फोट किया था। ताकि पूरी दुनिया में भारत के प्रति हो रही मानवीय दुर्दशा और जातीय हिंसा को देखा जा सकें।

आठ अक्टूबर का सूरज निकलने से पहले सीआईए के अमेरिकी - क्यूबाई एजेंटों और गुरिल्लारोधी सेना विशेषज्ञों की देखरेख में प्रशिक्षित बोलिवियाई आर्मी रेंजर्स कैप्टन गैरी प्राडो सालमन की कमान में अलयूरो पहाड़ी पर कमांड पोस्ट लगाने के बाद नीचे बीहड़ के दर्रे ब्राडा डेल यूरो में घुसने और निकलने के रास्तों पर पहरा बैठा चुके थे। चे ने अपने दस्ते को तीन टुकड़ियों में बाँटकर पोजिशन लगाई और कुछ घंटों बाद गुरिल्ला टुकड़ियों का एक दूसरे से संपर्क टूट गया। चे की टुकड़ी ने, जिसमें उनको लेकर सात लड़ाके थे। गोलीबारी एक - दूसरे के तरफ से लगातार चल रही थी। चे की M-2 कार्बाइन बराबर आग उगल रही थी। दुश्मनों की तरफ से एक गोली कार्बाइन की नाल पर आ लगी और कार्बाइन को बेकाम कर गई। पिस्तौल की मैगजीन पहले ही गुम हो चुकी थी। चे पूरी तरह निहत्थे हो चुके थे। तभी एक और गोली सनसनाती आकर बाईं जाँघ में पैबस्त हो गयी और तीसरी उनकी कैम्प को चीरती निकल गयी। घायल जाँघ के चलते चे अपने बूते चल पाने में लाचार हो गए। विली ने एक हाथ में अपनी मशीनगन थामी, दूसरी से अपने कमांडेंट को सहारा दिया और दोनों वहाँ से निकलने में एक खड्डे का किनारा पकड़कर चढ़ने लगे। ऊपर कैप्टन प्राडो की प्लाटून के तीन फौजी घात लगाए थे जिनकी नजर उन पर पड़ गयी। जैसे ही चे और विली ऊपर आगे बढ़े, पास की झाड़ी से सार्जेंट बर्नाडिर्नो हुआंका दो और फौजियों के साथ बाहर निकला और गन तानकर दोनों को अपने हथियार गिराकर समर्पण के लिए ललकारा। चे गोली चलाने की हालात में नहीं थे। विली भी चे को सँभाले होने के चलते एक हाथ से मशीनगन से तुरंत निशाना नहीं ले सके। या फिर उस हालात में गोली न चलाना बेहतर समझा हो। निशाना लेने के बावजूद हुआंका और उसके सिपाहियों के हाथ कँपकँपा रहे थे। वे काफी नर्वस और असमंजस में थे। तभी विली ने अपनी बंदूक जमीन पर डाली और कड़कती आवाज में कहा, ' खबरदार, ये हैं नेशनल लिबरेशन आर्मी के कमांडर चे गुवारा, इनके साथ इज्जत से पेश आना।' कहा यह भी जाता है कि खुद चे ने हुआंका का जवाब दिया था, गोली चलाने की जुर्रत मत करना, मैं चे गुवारा हूँ और मुर्दा की बजाय जिन्दा तुम लोगों के लिए ज्यादा कीमती हूँ।'


  पकड़कर लाएं गए चे से जब ले. कर्नल सेलीच सवाल पूछा - 'आप क्यूबाई हो या अर्जेन्टीनी ?' 'मैं क्यूबाई, अर्जेन्टीनी, बोलीवियाई, पेरूवियाई, इक्वाडोरियन... तुम समझ रहे हो न, सभी कुछ हूँ।' 'आप हमारे देश में क्यों आए।' 'क्या तुम देख नहीं पा रहे हो यहाँ किसान किस हालात में हैं ? वे करीब - करीब आदिम जमाने में जी रहे हैं, कलेजा चीर देने वाली दरिद्रता में, रहने - खाने - पकाने सभी कुछ के लिए बमुश्किल एक झोपड़ी, बदन पर कपड़ा नहीं, जैसे बेजुबान जानवरों की तरह परित्यक्त हों'। सेलिच ने पलटकर वार किया, ' मगर क्यूबा में भी तो यही सब कुछ है', चे ने जवाब दिया,' सरासर झूठ, इस बात से इनकार नहीं कि वहाँ अभी भी गरीबी है मगर वहाँ किसानों के पास प्रगति की उम्मीद है। यहाँ का किसान बिना किसी उम्मीद, बिना किसी सपने के जीता है, जैसे पैदा होता है उन्ही हालात में दम तोड़ देता है - अपनी मानवीय दशाओं में तनिक भी सुधार देखे बग़ैर।

सीआईए एजेंट फेलिक्स और बोलीवियाई सरकार की उन तमाम कोशिश अनन्तः सफल सिद्ध हुई। रोड्रिग्ज वह झोपड़ी में घुसा( जिसमें चे को रखा गया था) तो उसने चे से पूछा, क्या आप अपने परिवार के लिए कोई संदेश भेजना चाहते हैं। तो चे ने कहाँ," फिदेल से कहना, इस असफलता का मतलब क्रांति का अन्त हरगिज नहीं है, यह निश्चित रूप से यहाँ नहीं तो कहीं और विजय का परचम लहराएगी। एलिदा (पत्नी) से कहना यह सब भूल जाएं, फिर से विवाह करे, खुश रहे, बच्चों के पढ़ने - लिखने का हमेशा ध्यान रखती रहे। फौजियों से कहना, निशाना सटीक लगाएँ।" यही चे का अंतिम शब्द था। इसके बाद 9 अक्टूबर, 1967 को 1 बजकर 10 मिनट पर उन्तालीस साल की उम्र में चे गुवारा क्रान्तिवेदी पर शहादत का शिखरध्वज बनकर अमर हो गए।



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छतों पर सूखते कपड़ो को देखकर ऐसा लगता है जैसे छत बनाये ही इसीलिए जाते हैं ताकि छतों पर कपड़े सुखाए जा सकें। जाड़ा के मौसम में तो भारत के लगभग स...