बुधवार, 30 दिसंबर 2020

सूखते कपड़ो का छत!


छतों पर सूखते कपड़ो को देखकर ऐसा लगता है जैसे छत बनाये ही इसीलिए जाते हैं ताकि छतों पर कपड़े सुखाए जा सकें। जाड़ा के मौसम में तो भारत के लगभग सभी छतों पर कपड़े सुखाएं जा रहें होंगे। सूखते कपड़ो का एक अपना अलग ही मजा है। हवाओं से हिलते कपड़े और गुनगुनी धूप में कपड़ो का झूमना और खुद कपार और शरीर पर तेल लगाकर धूप सोखना इसका आनंद ही अलग है।

खासतौर पर शहरों में जहाँ कमरा ही एक या दो ज्यादे से ज्यादे तीन होता है उसमें तो कपड़ा सुखाया जा नही सकता और बालकनी में 4 या 5 कपड़ो से ज्यादा आ नही सकता है तो बचता है अब छत जिसपर बिल्डिंग के सभी लोग और जिनका अपना मकान भी है वे सब छतों पर जाकर रेगनी पर डालकर कपड़ा वही बैठ जाते हैं और फिर लेने लगते हैं धूप जैसे लगता है कि मानो समुंद्र के किनारे बैठे हों और एन्जॉय कर रहें हो। 

गाँवों में तो लोग खटिया या चौकी बाहर निकाल कर एक नींद ले भी लेते हैं। 

अगर आप जाड़ा के मौसम में देर से नहाते हैं जैसे 12 या 1 बजे के समय और फिर कपड़ा धो कर छत पर सुखाते हैं तो एक बात का ध्यान जरूर रखिएगा की मोटे कपड़े( जैसे में - जाड़ा का लोवर, स्वेटर, इनर और जैकेट) उसी दिन नही सुख पाएंगे हालांकि हल्के वाले कपड़े(जैसे में - बनियान, टी-शर्ट, शर्ट) उसी दिन सुख जाएंगे।

 


शुक्रवार, 25 दिसंबर 2020

मिसेज - एक्स, वाई, जेड

 भारतीय सिनेमा के रील लाइफ हो या हमारे जीवन के रियल लाइफ यहाँ महिलाओं को उनके पतियों के सर नेम से बुलाया/पुकारा जाता है। जैसे में - मिसेज सिंह, मिसेज मेहरा, मिसेज अग्रवाल, मिसेज राय, मिसेज मिश्रा और भी तमाम प्रकार के सर नेम से पुकारा जाता है। 

एक तो हमारे समाज में कम ही महिलाएं अपनी जातियों व सामाजिक रूढ़िवादिता को तोड़कर अपने मेहनत के दम पर नाम व शोहरत कमा पाती हैं और उस पर से समाज की बोझी सोच व पुरुषवादिता के दम पर उनकी जिंदगी की सबसे बड़ी कमाई 'अथाह मेहनत' का गला उसी दिन घोंट देते हैं। जिस दिन उनके नाम से नही उनके पतियों के नाम से बुलाया जाने लगता हैं। भारत में इन नामों को बुलाने वालों की संख्या करोड़ो में है। जो हर राज्यों में है। चाहे वह विकसित हो या विकासशील। 

क्या! यह कभी बदल पाएगा... पता नही। पर यह बात पुरुषों से अधिक उन मेहनतकश महिलाओं को सोचना चाहिए कि क्या अभी भी उनको किसी के सर नेम की जरूरत है या वह खुद अपना मुकाम हासिल कर ली हैं कि समाज उनको अपने नाम से बुलाये ना कि मिसेज सिंह, मिसेज दत्ता, मिसेज चतुर्वेदी या मिसेज कौर से। 

गुरुवार, 19 नवंबर 2020

छठ

 छठ....


    जब विश्व की सबसे प्राचीन सभ्यता की स्त्रियां अपने सम्पूर्ण वैभव के साथ सज-धज कर अपने आँचल में फल ले कर निकलती हैं तो लगता है जैसे संस्कृति स्वयं समय को चुनौती देती हुई कह रही हो, "देखो! तुम्हारे असँख्य झंझावातों को सहन करने के बाद भी हमारा वैभव कम नहीं हुआ है, हम सनातन हैं, हम भारत हैं। हम तबसे हैं जबसे तुम हो, और जबतक तुम रहोगे तबतक हम भी रहेंगे।"

      जब घुटने भर जल में खड़ी व्रती की सिपुलि में बालक सूर्य की किरणें उतरती हैं तो लगता है जैसे स्वयं सूर्य बालक बन कर उसकी गोद में खेलने उतरे हैं। स्त्री का सबसे भव्य, सबसे वैभवशाली स्वरूप वही है। इस धरा को "भारत माता" कहने वाले बुजुर्ग के मन में स्त्री का यही स्वरूप रहा होगा। कभी ध्यान से देखिएगा छठ के दिन जल में खड़े हो कर सूर्य को अर्घ दे रही किसी स्त्री को, आपके मन में मोह नहीं श्रद्धा उपजेगी।

      छठ वह प्राचीन पर्व है जिसमें राजा और रंक एक घाट पर माथा टेकते हैं, एक देवता को अर्घ देते हैं, और एक बराबर आशीर्वाद पाते हैं। धन और पद का लोभ मनुष्य को मनुष्य से दूर करता है, पर धर्म उन्हें साथ लाता है।

     अपने धर्म के साथ होने का सबसे बड़ा लाभ यह होता है कि आप अपने समस्त पुरुखों के आशीर्वाद की छाया में होते हैं। छठ के दिन नाक से माथे तक सिंदूर लगा कर घाट पर बैठी स्त्री अपनी हजारों पीढ़ी की अजियासास ननियासास की छाया में होती है, बल्कि वह उन्ही का स्वरूप होती है। उसके दउरे में केवल फल नहीं होते, समूची प्रकृति होती है। वह एक सामान्य स्त्री सी नहीं, अन्नपूर्णा सी दिखाई देती है। ध्यान से देखिये! आपको उनमें कौशल्या दिखेंगी, उनमें मैत्रेयी दिखेगी, उनमें सीता दिखेगी, उनमें अनुसुइया दिखेगी, सावित्री दिखेगी... उनमें पद्मावती दिखेगी, उनमें लक्ष्मीबाई दिखेगी, उनमें भारत माता दिखेगी। इसमें कोई संदेह नहीं कि उनके आँचल में बंध कर ही यह सभ्यता अगले हजारों वर्षों का सफर तय कर लेगी।

       छठ डूबते सूर्य की आराधना का पर्व है। डूबता सूर्य इतिहास होता है, और कोई भी सभ्यता तभी दीर्घजीवी होती है जब वह अपने इतिहास को पूजे। अपने इतिहास के समस्त योद्धाओं को पूजे और इतिहास में अपने विरुद्ध हुए सारे आक्रमणों और षड्यंत्रों को याद रखे।

      छठ उगते सूर्य की आराधना का पर्व है। उगता सूर्य भविष्य होता है, और किसी भी सभ्यता के यशश्वी होने के लिए आवश्यक है कि वह अपने भविष्य को पूजा जैसी श्रद्धा और निष्ठा से सँवारे... हमारी आज की पीढ़ी यही करने में चूक रही है, पर उसे यह करना ही होगा... यही छठ व्रत का मूल भाव है। 

      मैं खुश होता हूँ घाट जाती स्त्रियों को देख कर, मैं खुश होता हूँ उनके लिए राह बुहारते पुरुषों को देख कर, मैं खुश होता हूँ उत्साह से लबरेज बच्चों को देख कर... सच पूछिए तो यह मेरी खुशी नहीं, मेरी मिट्टी, मेरे देश, मेरी सभ्यता की खुशी है।

      मेरे देश की माताओं! परसों जब आदित्य आपकी सिपुलि में उतरें, तो उनसे कहिएगा कि इस देश, इस संस्कृति पर अपनी कृपा बनाये रखें, ताकि हजारों वर्ष बाद भी हमारी पुत्रवधुएँ यूँ ही सज-धज कर गंगा के जल में खड़ी हों और कहें- "उगs हो सुरुज देव, भइले अरघ के बेर..."

जय हो....



सूखते कपड़ो का छत!

छतों पर सूखते कपड़ो को देखकर ऐसा लगता है जैसे छत बनाये ही इसीलिए जाते हैं ताकि छतों पर कपड़े सुखाए जा सकें। जाड़ा के मौसम में तो भारत के लगभग स...