मैं जानता हूँ। जानता हूँ मैं!
अगर मैं यहाँ से बाहर निकला, नदी मुझे निगल जाएगी...
यही है मेरी नियति: आज मुझे मरना ही है।
मगर नहीं, हरगिज नहीं, इच्छाशक्ति जीत सकती है सब कुछ
बाधाएँ हैं, मैं मानता हूं
मगर मैं बाहर नहीं आना चाहता, भागना नहीं चाहता
अगर मरना ही है मुझे, तो इसे यहीं, गुफा में हो जाने दो।
गोलियाँ, क्या कर सकती हैं गोलियाँ मेरा अगर
मेरी नियति डूबकर मरना है। मगर मैं
जीतने जा रहा हूँ अपनी नियति को। जीती जा सकती है नियति
इच्छाशक्ति से।
मौत, हाँ, मगर बिंधी हुई
गोलियों से, छिदी हुई बेनटों से, अगर ऐसा नहीं तो नहीं।
डूबकर, बिल्कुल नहीं...
वह याद जो मेरे नाम से ज्यादा जिन्दा रहेगी
संघर्ष करना है, संघर्ष करते हुए मरना है।
19 जनवरी 1949 को चे गेवारा की लिखी गयी एक कविता जो दादी की मृत्यु की याद में हैं...
"एक क्रांतिकारी, जिसे पढ़ते हुए मैंने जाना कि परिस्थितियों से गुजरकर होते हुए लड़ना कितना आनंदमय होता है।"

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