बुधवार, 23 जनवरी 2019

पाब्लो नेरुदा - आज तो आज है और बीता कल बीत गया, यह तय है।

                  उत्सव


आज तो आज है, कल आ पहुँचा है
न जाने कितने - कैसे अंधेरों से बना:
हमें नहीं मालूम
इस नयी जन्मी दुनिया में उजाला है भी या नहीं:
आओ इसे आँच दें, इसे ठंड दें,
जब तक कि यह सुनहरी और भूरी न हो जाए
अनाज के पके कठोर दानों की तरह:
कि हर कोई, नवजात, त्रासदियों से बचे लोग,
           अंधे, मूक-बधिर, विकलांग, लुटे-पिटे, सभी,

देख सकें और कह सकें
कि वे जी सकतें हैं आजाद घूम सकतें हैं,
कि वे चख सकतें हैं, रख सकते हैं भविष्य के फल,
जो उस वर्तमान साम्रज्य में उपजेंगे जिसमें हमने
अन्वेषी को भी वही अधिकार दिया है जो महारानी को,
जिज्ञासु खगोली को भी उतना ही जितना पुरातन खेतिहर को,
उन मधुबालाओं को भी जो छत्ता बनाने के काम में जुटी हैं
और सबसे बढ़कर उनको जो भी अभी-अभी आए हैं,
वे लोग जो बढ़ते ही जाएंगे
नयी ध्वजाओं के साथ, जो जन्मी थीं लहू और पसीने की हर बूंद से
आज तो आज है और बीता कल बीत गया, यह तय है।
आज आने वाला कल भी है, और किसी गुजरे ठंडे साल के साथ
मैंने महसूस किया वह साल जो मेरे साथ छूट गया
और मैंने अपने साथ लेता गया।
इस बारे में कोई संशय नहीं। अक्सर मेरा कंकाल
हवा और बरसात झेलती वज्र हुई हड्डियों जैसे शब्दों से बनता है
और मैं वर्तमान का उत्सव मनाता हूँ अपने पीछे
किसी गीत या गवाही के बजाय,
शब्दों का एक हठीला, टिकाऊ कंकाल छोड़कर।

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