बुधवार, 22 मई 2019

पंडित राजकुमार शुक्ल!



27 दिसंबर 1916 का दिन था। हल्की - हल्की धूप खिली थी। लखनऊ के मोतीनगर स्थित नवाब वाजिद अली शाह के बगीचे में शामियाने से बने स्टेज पर बिहार का गँवई किसान धीरे - धीरे चढ़ रहा था। कांग्रेस के राष्ट्रीय अधिवेशन में मौजूद तकरीबन 2300 प्रतिनिधियों के बीच उसे अपने इलाके के किसानों की दुख-दर्द की दास्तान सुनानी थी। उसके सामने बैठे लोग पूरे देश से आए हुए थे। और यह गँवई किसान जब बिहार के एक बड़े वकील और जाने -माने राजनेता ब्रजकिशोर प्रसाद के बाद उसे अपना प्रस्ताव/भाषण रखना था इस अधिवेशन में। उस गँवई किसान को ठीक से हिंदी भी नही आती थी लेकिन तभी भी उसने अपनी बात इस प्रकार से रखी। 

" इस अधिवेशन में देश के कोने - कोने से पहुँचे सभी लोगों को चम्पारण की धरती से आए इस किसान राजकुमार शुक्ल का राम - राम। आज हम आप लोगों को अपने इलाके के किसानों की व्यथा सुनाने जा रहे हैं। हमारे इलाके में विलायती अंगरेज नील की खेती करवाते हैं। इन निलहे अंगरेजों के साथ लम्बे समय से हमारे यहाँ के किसानों - मजदूरों का तालमेल बैठ नहीं रह है। इन अंगरेजों ने नील की खेती कराने के लिए रामनगर और बेतिया के राजा से जमीन लीज पर ली है। उनकी शर्त के मुताबिक हम लोगों को हर एक बिगहा जमीन में से तीन कट्ठा को नील उगाने के नाम पर अलग रख देना पड़ता है। हालाँकि ये अंगरेज लोग इतने से भी खुश नहीं होते। वे गरीब रैयतों से मुफ्त में मजदूरी तो कराते ही हैं, उनके साथ बुरा बर्ताव भी करते हैं। वे लोग इतने ताकतवर हैं कि इलाके के दीवानी और फौजदारी मुकदमों का फैसला भी खुद कर लेते हैं और जिसको जैसा जी में आए वैसी सजा सुना देते हैं। हमलोगों ने सरकार से कई बार अनुरोध किया है कि वह इस मामले की जाँच कराए। मगर बार - बार कहने पर भी सरकार इस अनुरोध पर ध्यान नहीं देती है। 1908 ईस्वी में इसी बात को लेकर चम्पारण में बड़ा बावेला मचा था। उस वक्त बंगाल की सरकार ने एक अफसर को इस मामले की जाँच करने के लिए भेजा भी। लेकिन उस जाँच की रिपोर्ट को सार्वजनिक नहीं किया गया और उल्टे सैकड़ों किसानों को जेल भेज दिया गया। हम भी चम्पारण के ही रैयत हैं और हमको मालूम नहीं कि यहाँ से जब हम लौटेंगे तो यहाँ अपनी दुख भरी कहानी सुनानें की सजा हमें क्या दी जाएगी।" 

इतना कहकर वह चुप हो गया। इस भाषण को सुनकर अधिवेशन के टेंट में बैठे प्रतिभागी शेम - शेम कहने लगे। यह भाषण गँवई किसान राजकुमार शुक्ल ने दिया था। जिनकी पुण्यतिथि 20 मई को थी। 

उस अधिवेशन में बैठे तमाम लोगों को वह गँवई किसान देख रहा था कि किसे चम्पारण ले कर जाया जा सकें। उसकी निगाह वहाँ बैठे लोकमान्य तिलक, मदनमोहन मालवीय और मोहम्मद अली जिन्ना जैसे नेताओं के चेहरे से गुजरती हुई मोहनदास करमचंद गांधी नामक एक नेता पर टिक गई। जो कुछ - कुछ किसान जैसे दिख रहे थे। वे गुजरात की काठियावाड़ी परिधान पहने बैठे थे और लगातार नंगे पाँव चलने की वजह से उनके पाँव सूज गए थे। वह सोचने लगा, और कोई चले-न-चले इनको तो किसी भी सूरत में अपने साथ चम्पारण ले जाना है। उसे पिछले साल कानपुर से छपने वाले अखबार "प्रताप" के युवा सम्पादक गणेश शंकर विद्यार्थी की बात याद आ गई। उन्होंने कहाँ था, " पंडित जी, गांधी को पकड़कर चम्पारण ले जाइए। उन्हीं से काम बनेगा। दक्षिण अफ्रीका में इस गुजराती वकील ने बड़ा काम किया है। इसको अंगरेजों को हराना आता है।"

फिर वही तम्बू में रात के समय बाबू ब्रजकिशोर प्रसाद के साथ वह गँवई किसान गांधी से मिलकर वहाँ की सारी परेशानियां व दुख - दर्द बताया। जिससे गांधी वहाँ चलने पर मजबूर हुए। और जब गांधी चम्पारण गए तो सारा इतिहास बदल गया। नील किसानों की समस्याएं दूर हुई और भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की नींव वही पड़ गईं। 
                          चम्पारण में गांधी

अगर चम्पारण का यह गँवई किसान न रहता तो पता नही क्या होता। 20 मई को इस किसाननेता की पुण्यतिथि थी जिसने चम्पारण में नील किसानों की मुक्ति दिलाने में एक बड़ी महत्वपूर्ण भूमिका अदा की। 




गुरुवार, 16 मई 2019

गाजीपुर चुनाव विश्लेषण! पार्ट 2

 ऐसा क्या हो गया कि गाजीपुर सीट बसपा के खाते में चली गयीं। जो लोकसभा सीट सपा बहुलता की मानी जाती रही अचानक गठबंधन में वो सीट बसपा के हाथों में चली गयी। सांसद के तौर पर सपा यहाँ अपना वर्चस्व पहले ही जमा चुकी हैं सन 2004 और 09 में। तो फिर ये सीट बसपा के खाते में क्यों चली गयी। क्या सपा के अच्छे उम्मीदवार नहीं हैं। हैं न।

अब आतें हैं इस रणनीति पर कि जो मायावती अपने मुख्यमंत्री कार्यकाल के दौरान अंसारी बंधुओं को गुंडा, बदमाश व माफ़िया बताती रहीं और अपने कार्यकाल में इनके उभरते हाथ पर लगाम लगा कर इनके अपराधीकरण को ख़त्म कर दिया। फिर ऐसा क्या हो गया कि कुछ वर्षों बाद अपने पार्टी में शामिल करके इन्हें लोकसभा में गाजीपुर सीट दे दिया। आख़िर टिकट देने में क्या देखा गया। ईमानदारी, नेक इंसान, सामाजिक व्यक्ति ये तो हैं नही। और फिर क्या देखा गया। क्या ये अपने क्षेत्र में काम करवा सकतें हैं( इससे पहले जब अफ़ज़ाल अंसारी सांसद और विधायक चुने गए थे तो काम तो कुछ करवाएं नहीं थे)।

क्या अखिलेश यादव की भी रणनीति यही कह रही थी कि हम इन माफियाओं को टिकट देकर लोकसभा पहुचाएंगे। जब विधानसभा का चुनाव 2017 में हो रहा था तो मुख़्तार अंसारी को सपा से टिकट देने की बात चल रही थी लेकिन अकेले अखिलेश यादव ने इसका विरोध किया था। अच्छा भी किया था टिकट न देकर। लेकिन अब ऐसा क्या हो गया कि उनके बड़े भाई को गठबंधन का उम्मीदवार बनाया बसपा से और वो भी सपा बहुलता वाली सीट पर। क्या अब उनको भी माफियाओं से गठबंधन करने से सहजता हो रहीं है। और अफ़ज़ाल अंसारी के लिए गाजीपुर में रैली भी संबोधित कर चुके हैं। क्या अखिलेश यादव को भी अब ये लगने लगा हैं कि अफ़ज़ाल अंसारी अपने क्षेत्र का विकास करेंगे। क्या वे नहीं जानते कि इनका और इनके भाईयों का नाम हत्याओं और दंगो में दर्ज हैं। क्या वे नहीं जानते कि बीजेपी विधायक समेत सात लोगों की हत्या में उनके भाई पर मुकदमा दर्ज हैं। अफ़ज़ाल अंसारी पर भी कई मुकदमे दर्ज हैं। तो क्या वे विकास बंदूक और डर के दम करवाना चाहतें हैं। टिकट देकर तो यही लगता हैं।

अखिलेश यादव की जो छवि साफ दिख रही थी अब वो धूमिल नजर आ रहीं है। गाजीपुर में गठबंधन के उम्मीदवार को टिकट देकर तो यही लगता हैं। उन्हें कोई दूसरा उम्मीदवार भी तो मिल सकता था। बहुतेरे हैं बसपा के नेता गाजीपुर में। उन्हें भी टिकट दिया जा सकता था। लेकिन अफ़ज़ाल अंसारी को ही क्यों?

तो, मायावती और अखिलेश यादव ने साम्प्रदायिकता फैलाने वाले को टिकट देकर ये साफ कर दिया हैं कि वे क्या सोचतें हैं। साम्प्रदायिकता के बारे में। 

शुक्रवार, 10 मई 2019

गाजीपुर चुनाव विश्लेषण!



वर्तमान समय में बीजेपी के उम्मीदवार मनोज सिन्हा और सपा + बसपा के गठबंधन के उम्मीदवार अफ़ज़ाल अंसारी हैं। 2014 में मनोज सिन्हा चुनाव जीतकर केंद्र में मंत्री बने थे। रेल राज्य और स्वतंत्र दूरसंचार मंत्री थे। इससे पहले भी 2 बार सांसद रह चुके हैं।
अगर जमीनी हकीकत को समझे तो यहाँ मनोज सिन्हा ने रेल और दूरसंचार में बहुत ढेरो काम करवाया हैं जो जिले में आजतक नही हो सका था। लेकिन जातिगत रणनीति की वजह से अभी ये सीट इधर-उधर हिलोरें मार रहीं है। आप खुद जमीनी पड़ताल कर सकतें हैं। अभी कुछ दिन पहले ही एक वीडियो वायरल हुआ था जिसमें मनोज सिन्हा कह रहे थे कि अगर उनके कार्यकर्त्ता पर किसी ने उंगली उठायी तो उसकी उंगली सलामत नहीं रहेगी। हालांकि सत्य सही है कि खुद उनके भतीजे और बीजेपी विधायक समेत दर्जनों हत्याएं हो चुकी हैं लेकिन अभी तक उन सभी का कुछ हुआ नहीं।

और उधर बाहुबली मुख़्तार अंसारी के भाई अफ़ज़ाल अंसारी हैं। जिनका गाजीपुर के इतिहास में हत्या,छिनैती, लूट, वसूली, कमीशन बाजी का वजूद रहा है। अफ़ज़ाल अंसारी सांसद और विधायक दोनों रह चुके हैं लेकिन काम कुछ भी नही करवाया है अपने कार्यकाल के दौरान। आप गाजीपुर में किसी से भी पूछ सकते है। और इनके परदादा मत जाइएगा। वे अच्छे थे लेकिन ये नही हैं। ये माफिया हैं।

चुनाव बस जीत हार की नहीं हो रही है। गाजीपुर में शांति चाहिए और इसके साथ - साथ यहाँ विकास भी चाहिए। जो अफ़ज़ाल अंसारी नही करवा सकते। अगर यह व्यक्ति चुनाव जीत जाता है तो भय, असुरक्षा का माहौल और दबंगई फिर से शुरू हो जाएगी।

सोचना आपको हैं? कि वोट किसे दें। आप खुद सोचें।

सूखते कपड़ो का छत!

छतों पर सूखते कपड़ो को देखकर ऐसा लगता है जैसे छत बनाये ही इसीलिए जाते हैं ताकि छतों पर कपड़े सुखाए जा सकें। जाड़ा के मौसम में तो भारत के लगभग स...