27 दिसंबर 1916 का दिन था। हल्की - हल्की धूप खिली थी। लखनऊ के मोतीनगर स्थित नवाब वाजिद अली शाह के बगीचे में शामियाने से बने स्टेज पर बिहार का गँवई किसान धीरे - धीरे चढ़ रहा था। कांग्रेस के राष्ट्रीय अधिवेशन में मौजूद तकरीबन 2300 प्रतिनिधियों के बीच उसे अपने इलाके के किसानों की दुख-दर्द की दास्तान सुनानी थी। उसके सामने बैठे लोग पूरे देश से आए हुए थे। और यह गँवई किसान जब बिहार के एक बड़े वकील और जाने -माने राजनेता ब्रजकिशोर प्रसाद के बाद उसे अपना प्रस्ताव/भाषण रखना था इस अधिवेशन में। उस गँवई किसान को ठीक से हिंदी भी नही आती थी लेकिन तभी भी उसने अपनी बात इस प्रकार से रखी।
" इस अधिवेशन में देश के कोने - कोने से पहुँचे सभी लोगों को चम्पारण की धरती से आए इस किसान राजकुमार शुक्ल का राम - राम। आज हम आप लोगों को अपने इलाके के किसानों की व्यथा सुनाने जा रहे हैं। हमारे इलाके में विलायती अंगरेज नील की खेती करवाते हैं। इन निलहे अंगरेजों के साथ लम्बे समय से हमारे यहाँ के किसानों - मजदूरों का तालमेल बैठ नहीं रह है। इन अंगरेजों ने नील की खेती कराने के लिए रामनगर और बेतिया के राजा से जमीन लीज पर ली है। उनकी शर्त के मुताबिक हम लोगों को हर एक बिगहा जमीन में से तीन कट्ठा को नील उगाने के नाम पर अलग रख देना पड़ता है। हालाँकि ये अंगरेज लोग इतने से भी खुश नहीं होते। वे गरीब रैयतों से मुफ्त में मजदूरी तो कराते ही हैं, उनके साथ बुरा बर्ताव भी करते हैं। वे लोग इतने ताकतवर हैं कि इलाके के दीवानी और फौजदारी मुकदमों का फैसला भी खुद कर लेते हैं और जिसको जैसा जी में आए वैसी सजा सुना देते हैं। हमलोगों ने सरकार से कई बार अनुरोध किया है कि वह इस मामले की जाँच कराए। मगर बार - बार कहने पर भी सरकार इस अनुरोध पर ध्यान नहीं देती है। 1908 ईस्वी में इसी बात को लेकर चम्पारण में बड़ा बावेला मचा था। उस वक्त बंगाल की सरकार ने एक अफसर को इस मामले की जाँच करने के लिए भेजा भी। लेकिन उस जाँच की रिपोर्ट को सार्वजनिक नहीं किया गया और उल्टे सैकड़ों किसानों को जेल भेज दिया गया। हम भी चम्पारण के ही रैयत हैं और हमको मालूम नहीं कि यहाँ से जब हम लौटेंगे तो यहाँ अपनी दुख भरी कहानी सुनानें की सजा हमें क्या दी जाएगी।"
इतना कहकर वह चुप हो गया। इस भाषण को सुनकर अधिवेशन के टेंट में बैठे प्रतिभागी शेम - शेम कहने लगे। यह भाषण गँवई किसान राजकुमार शुक्ल ने दिया था। जिनकी पुण्यतिथि 20 मई को थी।
उस अधिवेशन में बैठे तमाम लोगों को वह गँवई किसान देख रहा था कि किसे चम्पारण ले कर जाया जा सकें। उसकी निगाह वहाँ बैठे लोकमान्य तिलक, मदनमोहन मालवीय और मोहम्मद अली जिन्ना जैसे नेताओं के चेहरे से गुजरती हुई मोहनदास करमचंद गांधी नामक एक नेता पर टिक गई। जो कुछ - कुछ किसान जैसे दिख रहे थे। वे गुजरात की काठियावाड़ी परिधान पहने बैठे थे और लगातार नंगे पाँव चलने की वजह से उनके पाँव सूज गए थे। वह सोचने लगा, और कोई चले-न-चले इनको तो किसी भी सूरत में अपने साथ चम्पारण ले जाना है। उसे पिछले साल कानपुर से छपने वाले अखबार "प्रताप" के युवा सम्पादक गणेश शंकर विद्यार्थी की बात याद आ गई। उन्होंने कहाँ था, " पंडित जी, गांधी को पकड़कर चम्पारण ले जाइए। उन्हीं से काम बनेगा। दक्षिण अफ्रीका में इस गुजराती वकील ने बड़ा काम किया है। इसको अंगरेजों को हराना आता है।"
फिर वही तम्बू में रात के समय बाबू ब्रजकिशोर प्रसाद के साथ वह गँवई किसान गांधी से मिलकर वहाँ की सारी परेशानियां व दुख - दर्द बताया। जिससे गांधी वहाँ चलने पर मजबूर हुए। और जब गांधी चम्पारण गए तो सारा इतिहास बदल गया। नील किसानों की समस्याएं दूर हुई और भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की नींव वही पड़ गईं।
चम्पारण में गांधी
अगर चम्पारण का यह गँवई किसान न रहता तो पता नही क्या होता। 20 मई को इस किसाननेता की पुण्यतिथि थी जिसने चम्पारण में नील किसानों की मुक्ति दिलाने में एक बड़ी महत्वपूर्ण भूमिका अदा की।

