गुरुवार, 16 मई 2019

गाजीपुर चुनाव विश्लेषण! पार्ट 2

 ऐसा क्या हो गया कि गाजीपुर सीट बसपा के खाते में चली गयीं। जो लोकसभा सीट सपा बहुलता की मानी जाती रही अचानक गठबंधन में वो सीट बसपा के हाथों में चली गयी। सांसद के तौर पर सपा यहाँ अपना वर्चस्व पहले ही जमा चुकी हैं सन 2004 और 09 में। तो फिर ये सीट बसपा के खाते में क्यों चली गयी। क्या सपा के अच्छे उम्मीदवार नहीं हैं। हैं न।

अब आतें हैं इस रणनीति पर कि जो मायावती अपने मुख्यमंत्री कार्यकाल के दौरान अंसारी बंधुओं को गुंडा, बदमाश व माफ़िया बताती रहीं और अपने कार्यकाल में इनके उभरते हाथ पर लगाम लगा कर इनके अपराधीकरण को ख़त्म कर दिया। फिर ऐसा क्या हो गया कि कुछ वर्षों बाद अपने पार्टी में शामिल करके इन्हें लोकसभा में गाजीपुर सीट दे दिया। आख़िर टिकट देने में क्या देखा गया। ईमानदारी, नेक इंसान, सामाजिक व्यक्ति ये तो हैं नही। और फिर क्या देखा गया। क्या ये अपने क्षेत्र में काम करवा सकतें हैं( इससे पहले जब अफ़ज़ाल अंसारी सांसद और विधायक चुने गए थे तो काम तो कुछ करवाएं नहीं थे)।

क्या अखिलेश यादव की भी रणनीति यही कह रही थी कि हम इन माफियाओं को टिकट देकर लोकसभा पहुचाएंगे। जब विधानसभा का चुनाव 2017 में हो रहा था तो मुख़्तार अंसारी को सपा से टिकट देने की बात चल रही थी लेकिन अकेले अखिलेश यादव ने इसका विरोध किया था। अच्छा भी किया था टिकट न देकर। लेकिन अब ऐसा क्या हो गया कि उनके बड़े भाई को गठबंधन का उम्मीदवार बनाया बसपा से और वो भी सपा बहुलता वाली सीट पर। क्या अब उनको भी माफियाओं से गठबंधन करने से सहजता हो रहीं है। और अफ़ज़ाल अंसारी के लिए गाजीपुर में रैली भी संबोधित कर चुके हैं। क्या अखिलेश यादव को भी अब ये लगने लगा हैं कि अफ़ज़ाल अंसारी अपने क्षेत्र का विकास करेंगे। क्या वे नहीं जानते कि इनका और इनके भाईयों का नाम हत्याओं और दंगो में दर्ज हैं। क्या वे नहीं जानते कि बीजेपी विधायक समेत सात लोगों की हत्या में उनके भाई पर मुकदमा दर्ज हैं। अफ़ज़ाल अंसारी पर भी कई मुकदमे दर्ज हैं। तो क्या वे विकास बंदूक और डर के दम करवाना चाहतें हैं। टिकट देकर तो यही लगता हैं।

अखिलेश यादव की जो छवि साफ दिख रही थी अब वो धूमिल नजर आ रहीं है। गाजीपुर में गठबंधन के उम्मीदवार को टिकट देकर तो यही लगता हैं। उन्हें कोई दूसरा उम्मीदवार भी तो मिल सकता था। बहुतेरे हैं बसपा के नेता गाजीपुर में। उन्हें भी टिकट दिया जा सकता था। लेकिन अफ़ज़ाल अंसारी को ही क्यों?

तो, मायावती और अखिलेश यादव ने साम्प्रदायिकता फैलाने वाले को टिकट देकर ये साफ कर दिया हैं कि वे क्या सोचतें हैं। साम्प्रदायिकता के बारे में। 

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