( तस्वीर - इनके फ़ेसबुक वॉल से)
बिहार के पूर्णिया जिले के चनका गाँव के रहने वाले गिरिन्द्रनाथ झा वर्तमान समय में किसान, लेखक व ब्लॉगर हैं। ये बेहद ही मृदभाषी व सरल इंसान हैं। अपने ब्लॉग "अनुभव" पर देश-दुनिया व गाँव की बातें बड़ी सहजता, प्रखरता व साफगोई से उठाते हैं। आप इनके ब्लॉग पर जाकर इसका अनुभव भी कर सकते हैं कि कैसे नए-नए शब्दों के कलात्मक से रचनाएँ लिखतें रहतें हैं। और फ़ेसबुक पर भी गाँव - घर व समाज की बात लिखते रहतें हैं।
गिरिन्द्रनाथ झा की पढ़ाई बचपन से ही विभिन्न शहरों में हुई और अपना ग्रेजुएशन दिल्ली यूनिवर्सिटी के सत्यवती कॉलेज से अर्थशास्त्र में किया और फिर वाईएमसीए इंस्टीट्यूट से प्रिंट मीडिया में पोस्ट ग्रेजुएशन। इसके बाद आईएनए न्यूज़ पत्रिका से जुड़ गए। इसी के साथ सीएसडीएस-सराय की फेलोशिप से प्रवासी इलाकों में टेलीफोन बूथ पर रिसर्च किया। देश के बड़े- बड़े संस्थानों में काम किया।
हालांकि गिरिन्द्रनाथ झा का मन काम करते हुए गाँव में ही बसता रहता था। इसलिए सन 2006 से ही जब भी वे गाँव जाते तो वहाँ कुछ न कुछ कदंब के पेड़ जरूर लगा आते। उनके दिमाग में गाँव में एक ऐसा घर बनाने का सपना पनपने लगा जहाँ शहरों के लोग भी आकर रहने को उत्सुक हो। हर छुट्टी पर गाँव आकर पेड़ लगाने का सिलसिला यूँही चलता रहा पर गिरिन्द्रनाथ झा अपने बाबूजी के आगे गाँव में ही बस जाने की बात का उल्लेख नही कर पाए। पर नियति को कुछ और ही मंजूर था। सन 2012 में जब गिरिन्द्रनाथ झा अपने पत्रकारिता के शिखर पर थे तो अचानक एक दिन उनके बाबूजी को ब्रेन हैमरेज होने की खबर आई। और वें सब कुछ छोड़कर कानपुर से चनका चले गए। और अपने बाबूजी की सेवा में लग गए और साथ ही साथ अपने 17 बीघा पुस्तैनी जमीन पर खेती करने लगें।
गिरिन्द्रनाथ झा कहतें हैं कि " मुझे बचपन से ही लिखने का शौक रहा है और गाँव आपको कई रोचक कहानियां देता है। यूँ कह लीजिए कि एक लेखक के लिए गाँव में ढेर सारा रॉ मैटेरियल उपलब्ध होता है। ऊपर से गाँव का होते हुए भी मुझे गाँव में रहने का मौका ही नहीं मिला। शायद यही वो कारण था जिसकी वजह से गाँव हमेशा मुझे अपनी ओर खींचता था।"
राजकमल प्रकाशन की लघु प्रेम कथा "लप्रेक" श्रृंखला की तीसरी किताब "इश्क़ में माटी सोना" इन्होंने ही लिखी हैं।
" ......और आज जब उसी शाम ने
फिर से दस्तक दे ही दी है तो एक बात कहूँ....
मैंने आज मौसम- भर का वसन्त तुम्हारे नाम कर दिया हैं!
सुबह की डाक का इंतजार करना...
बस, कबूल कर लेना..."

लप्रेक श्रृंखला के जरिए बहुत सारें लोगों ने इनके लिखें हुए रचना को ढेर सारा प्यार दिया। गिरिन्द्रनाथ झा गाँव के बारें में कहतें हैं कि " अक्सर गाँव की छवि एक दुःखदायी जगह की होती है, जहाँ गरीबी है, भुखमरी है, कीचड़ है और सिर्फ असुविधाएं है। पर दुख कहाँ नहीं होता? आपको शहरों में जब नौकरी में इंसेंटिव नहीं मिलता तब दुःख नही होता? बस गाँव भी वैसा ही है; यहाँ दुःख तो है पर शान्ति भी है, सुख भी है, और माटी की खुश्बू का मज़ा भी है। मैं शहर की गाँव के प्रति इसी मानसिकता को बदलना चाहता हूँ।"
अपने ब्लॉग " अनुभव" पर हमेशा लिखते रहने के कारण साल 2015 में एबीपी न्यूज़ और दिल्ली सरकार की ओर से इन्हें सर्वश्रेष्ठ हिंदी ब्लॉग का सम्मान भी मिल चुका है। इसके अलावा राजनीतिक व सामाजिक विषयों पर एनडीटीवी, बीबीसी, दैनिक व हिंदुस्तान जैसी कई अखबारों और न्यूज़ बेबसाइट के लिए लिखते रहतें हैं। इसके साथ - साथ बाहरी दुनिया से खुद व अपने गाँव चनका को भी जोड़े रखतें हैं।
गिरिन्द्रनाथ झा अपने गाँव चनका रेसीडेंसी को फेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और अन्य न्यूज़ वेबसाइटों पर ला चुकें है इसके लिए वह अपने यहाँ कई तरह के कार्यक्रम आयोजित करतें रहतें है ताकि लोगों का नजरिया गाँवो के प्रति बदल सकें और गाँवो की समस्याओं को ख़त्म करने की पहल की जा सकें।
गिरिन्द्रनाथ झा फणीश्वरनाथ 'रेणु' के लिखें गए साहित्यिक उपन्यास जैसे- मैला आँचल और परती परिकथा में लिखीं गयीं बाते अपने फ़ेसबुक पेज और ब्लॉग पर लिखतें रहतें हैं। जिससे उनका 'रेणु' के प्रति प्यार व झुकाव दिखता हैं। और पूर्णिया के बारे फणीश्वरनाथ "रेणु" का लिखा गया यह 'कोट' बहुत ही प्रसिद्ध है -
" आवरण देबे पटुआ, पेट भरन देबे धान,
पूर्णिया के बसैया, रहे चदरवा तान।"
गिरिन्द्रनाथ झा कहतें हैं "अगर धान मेरे लिए बेटी है तो मक्का मेरे लिए बेटा, जो मुझे साल भर का राशन पानी देता है। लेकिन याद रखियेगा रोटी के लिए गेहूं, चावल के लिए धान और मल्टीप्लेक्स में आपके पॉपकॉर्न के लिए मक्का हम सभी उपजाते हैं। अगर एक आँधी-पानी-सूखा हमें बर्बाद कर सकता है तो याद रखिये एक अच्छा मानसून हमें बम्पर फ़सल भी देगा।" यह मार्मिक शब्द कई हमारे जैसे लोगों के लिए हौसलाअफ़जाई का काम करता है।
बिहार के पूर्णिया जिले के चनका गाँव के रहने वाले गिरिन्द्रनाथ झा वर्तमान समय में किसान, लेखक व ब्लॉगर हैं। ये बेहद ही मृदभाषी व सरल इंसान हैं। अपने ब्लॉग "अनुभव" पर देश-दुनिया व गाँव की बातें बड़ी सहजता, प्रखरता व साफगोई से उठाते हैं। आप इनके ब्लॉग पर जाकर इसका अनुभव भी कर सकते हैं कि कैसे नए-नए शब्दों के कलात्मक से रचनाएँ लिखतें रहतें हैं। और फ़ेसबुक पर भी गाँव - घर व समाज की बात लिखते रहतें हैं।
गिरिन्द्रनाथ झा की पढ़ाई बचपन से ही विभिन्न शहरों में हुई और अपना ग्रेजुएशन दिल्ली यूनिवर्सिटी के सत्यवती कॉलेज से अर्थशास्त्र में किया और फिर वाईएमसीए इंस्टीट्यूट से प्रिंट मीडिया में पोस्ट ग्रेजुएशन। इसके बाद आईएनए न्यूज़ पत्रिका से जुड़ गए। इसी के साथ सीएसडीएस-सराय की फेलोशिप से प्रवासी इलाकों में टेलीफोन बूथ पर रिसर्च किया। देश के बड़े- बड़े संस्थानों में काम किया।
हालांकि गिरिन्द्रनाथ झा का मन काम करते हुए गाँव में ही बसता रहता था। इसलिए सन 2006 से ही जब भी वे गाँव जाते तो वहाँ कुछ न कुछ कदंब के पेड़ जरूर लगा आते। उनके दिमाग में गाँव में एक ऐसा घर बनाने का सपना पनपने लगा जहाँ शहरों के लोग भी आकर रहने को उत्सुक हो। हर छुट्टी पर गाँव आकर पेड़ लगाने का सिलसिला यूँही चलता रहा पर गिरिन्द्रनाथ झा अपने बाबूजी के आगे गाँव में ही बस जाने की बात का उल्लेख नही कर पाए। पर नियति को कुछ और ही मंजूर था। सन 2012 में जब गिरिन्द्रनाथ झा अपने पत्रकारिता के शिखर पर थे तो अचानक एक दिन उनके बाबूजी को ब्रेन हैमरेज होने की खबर आई। और वें सब कुछ छोड़कर कानपुर से चनका चले गए। और अपने बाबूजी की सेवा में लग गए और साथ ही साथ अपने 17 बीघा पुस्तैनी जमीन पर खेती करने लगें।
गिरिन्द्रनाथ झा कहतें हैं कि " मुझे बचपन से ही लिखने का शौक रहा है और गाँव आपको कई रोचक कहानियां देता है। यूँ कह लीजिए कि एक लेखक के लिए गाँव में ढेर सारा रॉ मैटेरियल उपलब्ध होता है। ऊपर से गाँव का होते हुए भी मुझे गाँव में रहने का मौका ही नहीं मिला। शायद यही वो कारण था जिसकी वजह से गाँव हमेशा मुझे अपनी ओर खींचता था।"
राजकमल प्रकाशन की लघु प्रेम कथा "लप्रेक" श्रृंखला की तीसरी किताब "इश्क़ में माटी सोना" इन्होंने ही लिखी हैं।
" ......और आज जब उसी शाम ने
फिर से दस्तक दे ही दी है तो एक बात कहूँ....
मैंने आज मौसम- भर का वसन्त तुम्हारे नाम कर दिया हैं!
सुबह की डाक का इंतजार करना...
बस, कबूल कर लेना..."

लप्रेक श्रृंखला के जरिए बहुत सारें लोगों ने इनके लिखें हुए रचना को ढेर सारा प्यार दिया। गिरिन्द्रनाथ झा गाँव के बारें में कहतें हैं कि " अक्सर गाँव की छवि एक दुःखदायी जगह की होती है, जहाँ गरीबी है, भुखमरी है, कीचड़ है और सिर्फ असुविधाएं है। पर दुख कहाँ नहीं होता? आपको शहरों में जब नौकरी में इंसेंटिव नहीं मिलता तब दुःख नही होता? बस गाँव भी वैसा ही है; यहाँ दुःख तो है पर शान्ति भी है, सुख भी है, और माटी की खुश्बू का मज़ा भी है। मैं शहर की गाँव के प्रति इसी मानसिकता को बदलना चाहता हूँ।"
अपने ब्लॉग " अनुभव" पर हमेशा लिखते रहने के कारण साल 2015 में एबीपी न्यूज़ और दिल्ली सरकार की ओर से इन्हें सर्वश्रेष्ठ हिंदी ब्लॉग का सम्मान भी मिल चुका है। इसके अलावा राजनीतिक व सामाजिक विषयों पर एनडीटीवी, बीबीसी, दैनिक व हिंदुस्तान जैसी कई अखबारों और न्यूज़ बेबसाइट के लिए लिखते रहतें हैं। इसके साथ - साथ बाहरी दुनिया से खुद व अपने गाँव चनका को भी जोड़े रखतें हैं।
गिरिन्द्रनाथ झा अपने गाँव चनका रेसीडेंसी को फेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और अन्य न्यूज़ वेबसाइटों पर ला चुकें है इसके लिए वह अपने यहाँ कई तरह के कार्यक्रम आयोजित करतें रहतें है ताकि लोगों का नजरिया गाँवो के प्रति बदल सकें और गाँवो की समस्याओं को ख़त्म करने की पहल की जा सकें।
गिरिन्द्रनाथ झा फणीश्वरनाथ 'रेणु' के लिखें गए साहित्यिक उपन्यास जैसे- मैला आँचल और परती परिकथा में लिखीं गयीं बाते अपने फ़ेसबुक पेज और ब्लॉग पर लिखतें रहतें हैं। जिससे उनका 'रेणु' के प्रति प्यार व झुकाव दिखता हैं। और पूर्णिया के बारे फणीश्वरनाथ "रेणु" का लिखा गया यह 'कोट' बहुत ही प्रसिद्ध है -
" आवरण देबे पटुआ, पेट भरन देबे धान,
पूर्णिया के बसैया, रहे चदरवा तान।"
गिरिन्द्रनाथ झा कहतें हैं "अगर धान मेरे लिए बेटी है तो मक्का मेरे लिए बेटा, जो मुझे साल भर का राशन पानी देता है। लेकिन याद रखियेगा रोटी के लिए गेहूं, चावल के लिए धान और मल्टीप्लेक्स में आपके पॉपकॉर्न के लिए मक्का हम सभी उपजाते हैं। अगर एक आँधी-पानी-सूखा हमें बर्बाद कर सकता है तो याद रखिये एक अच्छा मानसून हमें बम्पर फ़सल भी देगा।" यह मार्मिक शब्द कई हमारे जैसे लोगों के लिए हौसलाअफ़जाई का काम करता है।




