रविवार, 23 दिसंबर 2018

एक किसान, लेखक व पत्रकार की कहानी

                      ( तस्वीर - इनके फ़ेसबुक वॉल से)

बिहार के पूर्णिया जिले के चनका गाँव के रहने वाले गिरिन्द्रनाथ झा वर्तमान समय में किसान, लेखक व ब्लॉगर हैं। ये बेहद ही मृदभाषी व सरल इंसान हैं। अपने ब्लॉग "अनुभव" पर देश-दुनिया व गाँव की बातें बड़ी सहजता, प्रखरता व साफगोई से उठाते हैं। आप इनके ब्लॉग पर जाकर इसका अनुभव भी कर सकते हैं कि कैसे नए-नए शब्दों के कलात्मक से रचनाएँ लिखतें रहतें हैं। और फ़ेसबुक पर भी गाँव - घर व समाज की बात लिखते रहतें हैं।

 गिरिन्द्रनाथ झा की पढ़ाई बचपन से ही विभिन्न शहरों में हुई और अपना ग्रेजुएशन दिल्ली यूनिवर्सिटी के सत्यवती कॉलेज से अर्थशास्त्र में किया और फिर वाईएमसीए इंस्टीट्यूट से प्रिंट मीडिया में पोस्ट ग्रेजुएशन। इसके बाद आईएनए न्यूज़ पत्रिका से जुड़ गए। इसी के साथ सीएसडीएस-सराय की फेलोशिप से प्रवासी इलाकों में टेलीफोन बूथ पर रिसर्च किया। देश के बड़े- बड़े संस्थानों में काम किया।

 हालांकि गिरिन्द्रनाथ झा का मन काम करते हुए गाँव में ही बसता रहता था। इसलिए सन 2006 से ही जब भी वे गाँव जाते तो वहाँ कुछ न कुछ कदंब के पेड़ जरूर लगा आते। उनके दिमाग में गाँव में एक ऐसा घर बनाने का सपना पनपने लगा जहाँ शहरों के लोग भी आकर रहने को उत्सुक हो। हर छुट्टी पर गाँव आकर पेड़ लगाने का सिलसिला यूँही चलता रहा पर गिरिन्द्रनाथ झा अपने बाबूजी के आगे गाँव में ही बस जाने की बात का उल्लेख नही कर पाए। पर नियति को कुछ और ही मंजूर था। सन 2012 में जब गिरिन्द्रनाथ झा अपने पत्रकारिता के शिखर पर थे तो अचानक एक दिन उनके बाबूजी को ब्रेन हैमरेज होने की खबर आई। और वें सब कुछ छोड़कर कानपुर से चनका चले गए। और अपने बाबूजी की सेवा में लग गए और साथ ही साथ अपने 17 बीघा पुस्तैनी जमीन पर खेती करने लगें।

 गिरिन्द्रनाथ झा कहतें हैं कि " मुझे बचपन से ही लिखने का शौक रहा है और गाँव आपको कई रोचक कहानियां देता है। यूँ कह लीजिए कि एक लेखक के लिए गाँव में ढेर सारा रॉ मैटेरियल उपलब्ध होता है। ऊपर से गाँव का होते हुए भी मुझे गाँव में रहने का मौका ही नहीं मिला। शायद यही वो कारण था जिसकी वजह से गाँव हमेशा मुझे अपनी ओर खींचता था।"

  राजकमल प्रकाशन की लघु प्रेम कथा "लप्रेक" श्रृंखला की तीसरी किताब "इश्क़ में माटी सोना" इन्होंने ही लिखी हैं।
    " ......और आज जब उसी शाम ने
          फिर से दस्तक दे ही दी है तो एक बात कहूँ....
        मैंने आज मौसम- भर का वसन्त तुम्हारे नाम कर दिया हैं!
      सुबह की डाक का इंतजार करना...
      बस, कबूल कर लेना..."
                           
लप्रेक श्रृंखला के जरिए बहुत सारें लोगों ने इनके लिखें हुए रचना को ढेर सारा प्यार दिया। गिरिन्द्रनाथ झा गाँव के बारें में कहतें हैं कि " अक्सर गाँव की छवि एक दुःखदायी जगह की होती है, जहाँ गरीबी है, भुखमरी है, कीचड़ है और सिर्फ असुविधाएं है। पर दुख कहाँ नहीं होता? आपको शहरों में जब नौकरी में इंसेंटिव नहीं मिलता तब दुःख नही होता? बस गाँव भी वैसा ही है; यहाँ दुःख तो है पर शान्ति भी है, सुख भी है, और माटी की खुश्बू का मज़ा भी है। मैं शहर की गाँव के प्रति इसी मानसिकता को बदलना चाहता हूँ।"   
  
  अपने ब्लॉग " अनुभव" पर हमेशा लिखते रहने के कारण साल 2015 में एबीपी न्यूज़ और दिल्ली सरकार की ओर से इन्हें सर्वश्रेष्ठ हिंदी ब्लॉग का सम्मान भी मिल चुका है। इसके अलावा राजनीतिक व सामाजिक विषयों पर एनडीटीवी, बीबीसी, दैनिक व हिंदुस्तान जैसी कई अखबारों और न्यूज़ बेबसाइट के लिए लिखते रहतें हैं। इसके साथ - साथ बाहरी दुनिया से खुद व अपने गाँव चनका को भी जोड़े रखतें हैं।


 गिरिन्द्रनाथ झा अपने गाँव चनका रेसीडेंसी को फेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और अन्य न्यूज़ वेबसाइटों पर ला चुकें है इसके लिए वह अपने यहाँ कई तरह के कार्यक्रम आयोजित करतें रहतें है ताकि लोगों का नजरिया गाँवो के प्रति बदल सकें और गाँवो की समस्याओं को ख़त्म करने की पहल की जा सकें।

    गिरिन्द्रनाथ झा फणीश्वरनाथ 'रेणु' के लिखें गए साहित्यिक उपन्यास जैसे- मैला आँचल और परती परिकथा में लिखीं गयीं बाते अपने फ़ेसबुक पेज और ब्लॉग पर लिखतें रहतें हैं। जिससे उनका 'रेणु' के प्रति प्यार व झुकाव दिखता हैं। और पूर्णिया के बारे फणीश्वरनाथ "रेणु" का लिखा गया यह 'कोट' बहुत ही प्रसिद्ध है - 

  " आवरण देबे पटुआ, पेट भरन देबे धान,
      पूर्णिया के बसैया, रहे चदरवा तान।"    

गिरिन्द्रनाथ झा कहतें हैं  "अगर धान मेरे लिए बेटी है तो मक्का मेरे लिए बेटा, जो मुझे साल भर का राशन पानी देता है। लेकिन याद रखियेगा रोटी के लिए गेहूं, चावल के लिए धान और मल्टीप्लेक्स में आपके पॉपकॉर्न के लिए मक्का हम सभी उपजाते हैं। अगर एक आँधी-पानी-सूखा हमें बर्बाद कर सकता है तो याद रखिये एक अच्छा मानसून हमें बम्पर फ़सल भी देगा।" यह मार्मिक शब्द कई हमारे जैसे लोगों के लिए हौसलाअफ़जाई का काम करता है। 



  

गुरुवार, 12 जुलाई 2018

           ~ अधूरी यात्राएं...पार्ट टू ~


अगर ओपी सर का क्लास न होता तो उसके पानी पीने वाले कार्यक्रम में मैं भी सम्मलित हो जाता और लड़के लड़कियों को ओवरटेक करके एक बार अपनी उपस्थिति उसके आँखों मे दर्ज करवा ही देता। यह अलग बात है कि मैं उससे कुछ कह न सका। ओपी सर! कई बड़े - बड़े फेंकने वाले लौंडो को एक झापड़ में डेस्क के नीचे पहुँचाते जहाँ वह च्युंगम चिपकाते थे।सेक्शन अलग होने के कारण न मुझे वह भाव देती और न मेरे क्लास में बीच मांग फार के आने वाले सलमान खानों को। तमाम काली माई, देई माई और बरम बाबा से अपनी गुहार लगाई, लेकिन बार - बार कॉल ड्राप वाली समस्या यहाँ भी उत्पन्न हो जाती। एक बार मन्नत पूर्ण होने के लिए बताशा के रूप में प्रसाद भी चढ़ाया। उसको स्कूल के बेर बहुत पसंद थे जो उसकी लम्बी वाली दोस्त प्रतिदिन छत से सटे बेर को तोड़ लाती। उनका तीन लोगों का गैंग था और हम लोगों का ढाई।  एक बार इसी देशव्यापी कार्यक्रम के लिए प्रिंसीपल ऑफिस में हाजिरी लगवानी पड़ी। अगर अनिमेश को झूठा बेर आगे वाले लौंडो के बैग में रखने का शौक न होता और चलती - फिरती क्लास में लड़कों को कॉपी देने के लिए न मरता तो प्रिंसिपल आफिस में उससे मुलाकात न होती। आफिस में उसकी गैंग जैसे ही दस्तक दी की मेरी आँखें फट के बाहर आने लगी। उन लोगों के दस्तक से हम लोगों में हलचल होने लगी, तभी नाटे सर ने पूरी बात महाभारत कथा की तरह बताई। तब जाकर अंदर की खुशी बाहर ला सकें। मेरी निगाहें उसपर पड़ती और उसकी कहीं और! प्रिंसिपल ऐसे कुर्सी पर आराम फरमाते जैसे बड़ा भारी काम करके आये हो। 

      अगर उस दिन संविधान में आत्महत्या करना मौलिक अधिकार होता तो उसी समय उसके बालों को अपने गले में फसाकर जान दे देता। उसके सामने पीठ पर दो मुक्के, हाथों पर चार डंडे उपहार स्वरूप मिलें। और मुझे चीड़ इस बात पर हुई कि प्रतिदिन बेर तोड़ने वालियों को बस डांट कर भगा दिया गया।( कम से कम अगर महिला मास्टर न हो तो पुरुष प्रधान देश के पुरुष मास्टर दो डंडे मार ही देते। महिला हो तो लड़को के बराबर।) यह माहौल ही देशभर में एक बड़ा आंदोलन खड़ा करने के लिए काफी था। मार खाने के बाद प्यास जल्दी लग जाती है उस दिन पता चला। हाथों की गरमाहट को पानी से ठंडा कर रहे थे। तभी वह लोग भी आई। ज्यादे चोट तो नही आयीं - उसने कहाँ
नही - मैंने कहाँ 
पहली बार बस इतनी ही बात हुई। उसके अगले दिन वह पांचवी क्लास के समय पिछले दरवाजे के पास आकर खड़ी हो गयी। न कुछ बोलती और न ही कुछ इशारा करती। मेरी हिम्मत इतनी नही थी कि प्रिंसिपल क्लास को छोड़कर( और वो भी जो कल हमको मारा था) बाहर आ जाते और पानी पीने के बहाने उसके पीछे - पीछे बात करते करते चले जाते।
   शायद उसको उस दिन मेरा निकम्मेपन और बहादुरी का पता चल गया था। जो सपनों में मुझे बड़ा तीस मार ख़ाँ समझती थी। उसमें उसकी गलती नही थी अगर उस दिन उन लड़कियों को भी मार पड़ती तब उसे भी डर का पता चलता।

   किस्मत भी उस रेत की तरह है जो जल्दी चाहत के चक्कर मे मुट्टी तो तेज दब जाती, लेकिन रेत उससे और तेज फिसल जाती। 

गुरुवार, 5 जुलाई 2018

                        ~ अधूरी यात्राएं ~ 


भोरहरी में डकनिया तालाब स्टेशन के रेलवे लाइन के पास बैठकर शौचालय करने में बड़ा आंनद देता। जब राजधानी दस - बारह मीटर दूर से सिटी बजाते हुए निकलती और पाछा सुन्न हो जाता। हाई स्कूल पास करने के बाद उससे पहला प्यार हुआ था। नही दूसरा था। छोटे शहरों का प्यार आप से नही तुम से हुआ करता था। यह उसने बताया। उन दिनों एक ऐसी अफवाहें उड़ा करती थी कि जो स्कूल का सबसे खतरनाक मास्टर हो, जो स्कूल में कहीं से भी गुजर जाए तो लौंडो में हलचल हो जाती, किसी के हवाओं में बाल नीचे बैठ जाते तो किसी के कान का पर्दा दर्द करने लगता। स्कूल की दीवारों से बात सुनकर मैंने भी ट्यूशन जॉइन कर लिया। पहली बार उससे वही मुलाकात हुई थी। शायद यह कथन सत्य ही था कि अगर आप उस मास्टर से ट्यूशन लेते है तो वह कम मारता है चाहे गलती आपकी ही क्यों न हो। उन दिनों ट्यूशन फीस चार सौ पचास रुपये हुआ करती थी। स्कूल की हवाईबाजी के लिए ट्यूशन में हाथों पर फुला देने वाले प्रसाद खाने को मिलें। मुझे यह उपहार ही मिला था। उसने उसको खूब गरियाया और अपनों होंठो से मेरे हाथ चूमने लगीं। 

    उसको सिगरा पे घूमना अच्छा लगता था, और मुझें भी। दिन ऐसे ढलता जैसे सिनेमा हॉल में उसके साथ  बैठकर पिक्चर देखते - देखते मेरा हाथ उसकी साइड के गर्दन तक पहुँचते ही पिक्चर ख़त्म होने लगती, लेकिन उसका किस अभी भी बाक़ी रह जाता। उसे चॉकलेट बहुत पसंद थे और मुझे वे। मुझे नही पता कि साप्ताहिक एतवार किसने बनाया होगा, उन दिनों रामपुरी चाकू साथ लिए घूमता था। और जाहिर सी बात है बनाने वालों को स्कूली प्यार हुआ भी नही होगा। यह दिन आम जेलों की तरह न होके तिहाड़ जेल में बदल जाता और माता - पिता इसके सीसीटीवी बन जाते। उसके प्यार में हाई स्कूल पास होना जैसे मानो देश कि सबसे बड़ी परीक्षा पास कर लिया हो और उसने विदेश की। उसके जाने के दो साल बाद इंटर में हाई स्कूल से कम नंबर आया लेकिन यूपी ट्रिपल आईटी में डेढ़ हजार वीं रैंक थी। उन दिनों में भूखहड़ताल करके ढेर सारा पैसा इकट्ठा कर लिया था जो उसके जन्मदिन में गिफ्ट देने के चक्कर में हाथ धोना पड़ा। कई दिन तक रात में नींद भी नही आती थी। शायद उस दिन मुझे लंबा राष्ट्रीय किस भी मिला था। 

      उसके जाने के बाद कितनों की सिगरेट का धुँवा हवाओं में सम्मिलित कर दिया। मेरा मिथक टूट गया और पहला प्यार पाने के लिए वह तमाम मैसेज, दोस्तो से अपनी फरयादी भेजवाई और खुद कितनी बार मिलने की कोशिश की लेकिन उसने कभी भी आँख न मिलाई। क्या वह मुझसे इतना नाराज थी। अगर मुझमें भी कोई सुपरपॉवर होता तो उस समय मे जाकर उस हड़बड़ाई और झुनझुनाहट वाली गलती को मार डालता जिसको आज न झेलता पड़ता। हमारे समाज में प्यार करने वालो को सबसे नीच समझा जाता है। यही से हमारी अधूरी यात्राएं शुरू हो जाती है।


......... डकनिया तालाब स्टेशन कोटा में पड़ता है और सिगरा बनारस में। 

बुधवार, 4 जुलाई 2018

                      ~ कमरों का किराया ~



 बारह सौ रुपये कमरें का किराया था। जिसका आधा दरवाजा टूटा हुआ, खिड़की पे हिन्दी अखबार ऐसे पसरे थे मानो धन्नो के लिए यही बेस्ट जगह हो। उस दिन पता चला कि हिंदी अखबारों के पाठक किस और किन हालतों में पढ़ते है जिसमें सिर्फ मसाला ही रहता है। कमरें का भूगोलिकरण करते -करते अपने गाँव का भूसा वाला घर याद आ गया जिसमें भूसा को छोड़कर झाले, कीट - फतिंगे और छोटे - मोटे पल पोसुवे जानवर रहा करते थे। यह कमरा बिल्कुल उसी तरह था। इलाहाबाद में कमरों का एक अपना इतिहास है। पता नही अब तक साहित्य वालों ने गाँव देहात से आए लड़को को Transforming India कहकर कोई ज्ञानपीठ क्यों नही लें लेता। वहाँ तो कहावत भी हैं ' यहाँ भगवान को ढूढ़ना आसान है रूम को नही'। 

          
      वह दिन भी बहुत अजीब थे सात बजे की एकाउंट की क्लास लेने के चक्कर में कोचिंग जल्दी पहुँच जाता और बिना स्वाद के चाय पीने लगता। इसी उम्मीद में कि सबसे पहला नजर मेरा ही पड़े। उस दिन नारंगी बैंगल और कुर्ता था जो उसके हल्के नीले - काले लेंगिस से मिलता जुलता था। उसके आते ही लौंडे ने ठफरी चालू कर दी, लेकिन वह खिसियानी बिल्ली की तरह अंदर चली गयी ( अगर उसे खिसियानी बिल्ली का पता चल जाता तो उसके स्कूटी पर पीछे बैठकर उसके नाभि तक हाथ न पहुँचता और खुद चलाते समय धड़ाधड़ ब्रेक न मारने को मिलता)। वह हर रोज मैचिंग के ड्रेस पहन - पहन कर आती। पता नही कपड़े उसे अच्छे लगते या कपड़ों ने उसे पसंद कर लिया।  एक दिन ऐसे ही कॉफी हाउस में मैंने उसको टोक ही दिया। उसने बातों को ऐसे ध्यान न दिया हो जैसे कोई मंत्री गरीब किसान व मजदूर की बात न समझता हो। यहाँ उसके लिए गरीब यानी पेमेंट बैंकर मैं ही था। वहीं टूटे हुए दरवाजे के पास दो तखत पर रोटी सब्जी खाकर दिनभर की बातें आशु भईया को सब बताता और फिर सो जाता। 


      उस साझ को मैंने जिन्दगी भर दो बातों के लिए पछताया - पहला की वह हमेशा के लिए जा रही थी और मैंने उसे हमेशा की तरह गले लगाकर माथे पर न चूमा और दूसरा अपने जिगरी यार के मरने पर ना जा सका। उसी लॉज में रहते - रहते कई साल हो गए थे। दीवारों से अब अपनापन और मोह सा लगने लगा था। उस लॉज ने अपना एक परिवार दिया जहाँ भी जरूरत हुई सबने बिना डर के सबका साथ दिया।  मैं वह रात आजतक नही भूल पाया हूँ जिसमें एक बूढ़ी औरत के लिए बड़े भईया ने दुकानदार से लड़ाई कर लिया था। बात दरबदर बढ़ने लगी और दुकानदार जोश में होश खोकर राइफल निकाल कर भईया के सामने तान दिया। बातों की बहसाबहसी में राइफल की गोली निकल गयीं और सामने की दीवार पर जाकर धस गयी। लड़ाईयां अब भयंकर शुरू हो गयी। पूरे मार्किट में हल्ला हो गया कि लॉज के लड़कों ने लोकलों से लड़ाई कर लिया। इसी बीच में एक सहपाठी की हाथ टूट गयीं लेकिन हमने उनको खदेड़ ही दिया। थाना अस्पताल और चौकी एक करके उनपे कई धारा लगवाया गया (लॉ किये हुए लड़के किस दिन काम आते)। 

  
     यहाँ सवा ग्राम वाला लेखक यह जानना चाहता है कि आखिर क्यों लोग 'कमरों में रहकर एक खुद का कमरा' बना लेते। यह आजादी उसे बिना किसी परछाई के मिली। जो उसे आज यहाँ लिखने पर मजबूर कर दिया। 
     


मंगलवार, 3 जुलाई 2018

खेत खलिहान

                          खेत खलिहान 



कुछ दिनों बाद खेतों में अब धान की रोपनी शुरू होने वाली है जिसके लिए किसान अब अपने - अपने खेतों में पानी का लेव लगा रहे होंगे ताकि धान का बिया खेत मे अच्छे से गड़ सके। जिन राज्यों में मानसून अच्छी हुई होगी, वहाँ के किसानों के लिए राहत होंगी और वे बिना भागदौड़ के अपने - अपने खेतों की अच्छी तरह से सिंचाई कर सकेंगे। कई जगह खेतों में पानी ट्यूबल या नहरों से भी पहुचाये जाते है और कई ऐसे भी जगहें है जहाँ डीजल लगे मोटर से पानी की सिंचाई होती है( एक ये भी कारण है कि किसानी इतनी महंगी हो जाती हैं)। इसमें अकूत मेहनत लगी रहती है किसानी के लिए चिलचिलाती धूप हो या जाड़े की हाड़ गलाने वाली ठंडी या बिजली गिरती हुई बारिश हो सबमें खड़े होकर अपने फसल को देखना सबसे मुश्किल रहता है।

     जब भी बाढ़ या बिन मौसम बारिश से अपने उगे हुए फसलों को धरती पर गिरा देखते है सीने की आग दहल उठती है। हमने लहलहाती फसलों को गिरते देखा, जो फसल कट गई उसको सड़ते देखा। खेती - किसानी करते हुए लोगों ने धान को अपनी बेटी और मक्का को अपना बेटा मान लिया है। इसी उम्मीद में कि अगली बार फिर से नए अंदाज में इठलाती, बलखाती फसलों का नया शेप पैदा करूँगा। 

   सरकारों ने इनका हक़ मारने लिए अपना वजीफा बड़ा कर लिया। बिना किसान और गरीब की बात किये आजतक कोई नेता नही बन सके, लेकिन उनकी बातें आजतक न सुनी गयीं। 

शुक्रवार, 23 मार्च 2018

      जब तक तुम्हे यह खत मिलेगा,

  मैं दूर मंजिल की ओर जा चुका होऊंगा।


सुखदेव के नाम पत्र

प्रिय भाई,
   
 जब तक तुम्हें यह पत्र मिलेगा, मैं दूर मंजिल की ओर जा चुका होऊंगा। मेरा यकीन करना, आजकल मैं बहुत प्रसन्नचित अपने आखिरी सफर के लिए तैयार हूँ। अपनी जिन्दगी की सारी खुशियो और मधुर यादों के बावजूद मेरे दिल मे आजतक एक बात चुभती रही। वह यह कि मेरे ने मुझे गलत समझा और मुझ पर कमजोरी का बहुत ही गम्भीर आरोप लगाया। आज मैं पहले से कही ज्यादा पूरी तरह से संतुष्ट हूँ। मैं आज भी महसूस करता हूँ कि वह बात कुछ भी नही, बस गलतफहमी थी। गलत शक था, मेरे खुले व्यवहार के कारण मुझे बातूनी समझा गया और मेरे द्वारा सबकुछ स्वीकार कर लेने को कमजोरी माना गया।  लेकिन आज मैं महसूस कर रहा हूँ कि कोई गलतफहमी नही, मैं कमजोर नही, अपनो में से किसी से भी कमजोर नही। 
                  
              भाई मेरे, मैं साफ दिल से विदा लूँगा और तुम्हारी शंका भी दूर करूँगा। इसमे तुम्हारी बहुत कृपालुता होगी। ध्यान रहें, तुम्हे जल्दबाजी में कोई कदम नही उठाना चाहिए। सोच- समझकर और शान्ति से काम को आगे बढ़ाना चाहिए। अवसर पा लेने की जल्दबाजी ना करना। जनता के प्रति जो तुम्हारा फर्ज है उसे  निभाते हुए सावधानीपूर्वक करते रहना। सलाह के तौर पर मैं कहना चाहता हूँ कि शास्त्री मुझे पहले से ही अधिक अच्छा लग रहा है। मैं उसे सामने लाने की कोशिश करता हूँ, बशर्ते की वह अपनी साफगोई से अपने आपको एक अंधेरे भविष्य के लिए अर्पित करने के लिए सहमत हो। उसे साथियों के नजदीक आने दो ताकि वह अपने आचार- विचार का अध्ययन कर सकें। यदि वह अर्पित भाव से काम करेगा तो काफी लाभदायक और मूल्यवान साबित होगा। लेकिन जल्दबाजी न करना। तुम खुद एक अच्छे पारखी हो। जिस तरह जँचे, देख लेना। आ मेरे भाई, अब हम खुशियां मना सकें। 
              खैर, मैं कह सकता हूँ कि बहस के मामले में मुझसे अपने पक्ष पेश किए बिना नही रह जाता। मैं पुरजोर कहता हूँ कि मैं आशाओं और आकांक्षाओं से भरपूर जीवन की समस्त रंगीनियों से ओतप्रोत हूँ, लेकिन वक्त आने पर मैं सब कुछ कुर्बान कर दूँगा। सही अर्थों में यही बलिदान है। यह वस्तुएँ मनुष्य की राह में कभी भी अवरोध नही बन सकती, बशर्ते कि वह इंसान हो। जल्द ही तुम्हे इसका प्रमाण मिल जाएगा। किसी के चरित्र के सन्दर्भ में विचार करते समय एक बात विचारणीय होनी चाहिए कि क्या प्यार किसी इनसान के लिए मददगार साबित हुआ है? इसका जवाब आज मैं देता हूँ - हाँ, वह मेजिनी था। तुमने अवश्य पढ़ा होगा कि अपने पहले नाकाम विद्रोह, मन को कुचल डालनेवाली हार का दुख और दिवंगत साथियों की याद- यह सब वह बर्दास्त नही कर सकता था। वह पागल हो जाता या खुदकुशी कर लेता। लेकिन, प्रेमिका के एक पत्र से वह दुसरो जितना ही नही, बल्कि वह सबसे अधिक मजबूत हो गया।
           जहाँ तक प्यार के नैतिक स्तर का संबंध है, मैं यह कह सकता हूँ कि यह अपने में एक भावना से अधिक कुछ भी नही और यह पशुवृत्ति नही बल्कि मधुर मानवीय भावना है। प्यार सदैव मनवीयचरित्र को ऊचां करता है, कभी भी नीचा नही दिखता, बशर्ते कि वह प्यार प्यार हो। इन लड़कियों (प्रेमिकाओं) को कभी भी पागल नही कहा जा सकता जैसा कि हम फिल्मों में देखते हैं- वे सदैव पाशविक वृत्ति के हाथों में खेलती हैं। सच्चा प्यार कभी भी सृजित नही किया जा सकता। यह अपने आप ही आता है- कब, कोई कह नही सकता? 

                      मैं यह कह सकता हूँ कि नौजवान युवक- युवती आपस मे प्यार कर सकते है और वे अपने प्यार के सहारे अपने आवेगों से ऊपर उठ सकते है। अपनी पवित्रता कायम रखें रह सकते है। मैं यहाँ स्पष्ट कर देना चाहता हूँ कि जब मैंने प्यार को मानवीय कहा था तो यह किसी सामान्य व्यक्ति को लेकर नही कहा था, जहाँ तक कि बौद्विक स्तर पर सामान्य व्यक्ति होते है पर वह सबसे ऊँचे आदर्श स्थिति होगी जब मनुष्य प्यार, घृणा और अन्य सभी भावनाओ पर नियंत्रण पा लेगा। जब मनुष्य कर्म के आधार पर अपना पक्ष अपनाएगा। एक व्यक्ति कि दूसरे व्यक्ति से प्यार की निंदा की है, वह भी एक आदर्श स्थिति होने पर। मनुष्य के पास प्यार कि एक गहरी भावना होनी चाहिए जिसे वह एक व्यक्ति विशेष तक सीमित न करके सर्वव्यापी बना दें। 

    मेरे विचार से मैंने अपने पक्ष को काफी स्पष्ट कर दिया है। हाँ, एक बात मैं तुम्हे खासतौर पर बताना चाहता हूँ कि बावजूद क्रांतिकारी विचारों के हम नैतिकता सम्बन्धी सभी सामाजिक धारणाओं को नही अपना सकें। क्रांतिकारी बातें करके इस कमजोरी को बहुत सरलता से छिपाया जा सकता है, लेकिन वास्तविक जीवन में हम तुरंत ही थर- थर काँपना शुरू कर देते है। 

    मैं तुमसे अर्ज करूँगा कि तुम यह कमजोरी त्याग दो। अपने मन मे बिना कोई गलत भावना लाए अत्यंत नम्रतापूर्वक क्या मैं तुमसे आग्रह कर सकता हूँ कि तुमसे जो अति आदर्शवाद है उसे थोड़ा- सा कम कर दो। जो पीछे रहेंगे और मेरी- जैसी बीमारी का शिकार होंगे, उनसे बेरुखी व्यवहार न करना, झिड़ककर उनके दुख-दर्दो को न बढ़ाना , क्योकि उनको तुम्हारी हमदर्दी की जरूरत है। क्या मैं यह आशा रखूँ कि तुम किसी विशेष व्यक्ति के प्रति खुन्दक रखने के बजाय उनसे हमदर्दी रखोगे, उनको इसकी बहुत जरूरत है। तुम तब तक इन बातों को नही समझ सकते जब तक कि खुद इस चीज का शिकार न बनों। लेकिन मैं यह सबकुछ क्यो लिख रहा हूँ? दरअसल मैं अपनी बातें स्पष्ट तौर पर कहना चाहता हूँ। मैंने अपना दिल खोल दिया है। 

   तुम्हारी सफलताओ और जीवन के लिए            शुभकामनाओ के साथ।।।
        
    तुम्हारा,

     भगत सिंह 

     (राजकमल प्रकाशन के ब्लॉग से) 

सूखते कपड़ो का छत!

छतों पर सूखते कपड़ो को देखकर ऐसा लगता है जैसे छत बनाये ही इसीलिए जाते हैं ताकि छतों पर कपड़े सुखाए जा सकें। जाड़ा के मौसम में तो भारत के लगभग स...