खेत खलिहान
कुछ दिनों बाद खेतों में अब धान की रोपनी शुरू होने वाली है जिसके लिए किसान अब अपने - अपने खेतों में पानी का लेव लगा रहे होंगे ताकि धान का बिया खेत मे अच्छे से गड़ सके। जिन राज्यों में मानसून अच्छी हुई होगी, वहाँ के किसानों के लिए राहत होंगी और वे बिना भागदौड़ के अपने - अपने खेतों की अच्छी तरह से सिंचाई कर सकेंगे। कई जगह खेतों में पानी ट्यूबल या नहरों से भी पहुचाये जाते है और कई ऐसे भी जगहें है जहाँ डीजल लगे मोटर से पानी की सिंचाई होती है( एक ये भी कारण है कि किसानी इतनी महंगी हो जाती हैं)। इसमें अकूत मेहनत लगी रहती है किसानी के लिए चिलचिलाती धूप हो या जाड़े की हाड़ गलाने वाली ठंडी या बिजली गिरती हुई बारिश हो सबमें खड़े होकर अपने फसल को देखना सबसे मुश्किल रहता है।
जब भी बाढ़ या बिन मौसम बारिश से अपने उगे हुए फसलों को धरती पर गिरा देखते है सीने की आग दहल उठती है। हमने लहलहाती फसलों को गिरते देखा, जो फसल कट गई उसको सड़ते देखा। खेती - किसानी करते हुए लोगों ने धान को अपनी बेटी और मक्का को अपना बेटा मान लिया है। इसी उम्मीद में कि अगली बार फिर से नए अंदाज में इठलाती, बलखाती फसलों का नया शेप पैदा करूँगा।
सरकारों ने इनका हक़ मारने लिए अपना वजीफा बड़ा कर लिया। बिना किसान और गरीब की बात किये आजतक कोई नेता नही बन सके, लेकिन उनकी बातें आजतक न सुनी गयीं।


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