~ अधूरी यात्राएं...पार्ट टू ~
अगर ओपी सर का क्लास न होता तो उसके पानी पीने वाले कार्यक्रम में मैं भी सम्मलित हो जाता और लड़के लड़कियों को ओवरटेक करके एक बार अपनी उपस्थिति उसके आँखों मे दर्ज करवा ही देता। यह अलग बात है कि मैं उससे कुछ कह न सका। ओपी सर! कई बड़े - बड़े फेंकने वाले लौंडो को एक झापड़ में डेस्क के नीचे पहुँचाते जहाँ वह च्युंगम चिपकाते थे।सेक्शन अलग होने के कारण न मुझे वह भाव देती और न मेरे क्लास में बीच मांग फार के आने वाले सलमान खानों को। तमाम काली माई, देई माई और बरम बाबा से अपनी गुहार लगाई, लेकिन बार - बार कॉल ड्राप वाली समस्या यहाँ भी उत्पन्न हो जाती। एक बार मन्नत पूर्ण होने के लिए बताशा के रूप में प्रसाद भी चढ़ाया। उसको स्कूल के बेर बहुत पसंद थे जो उसकी लम्बी वाली दोस्त प्रतिदिन छत से सटे बेर को तोड़ लाती। उनका तीन लोगों का गैंग था और हम लोगों का ढाई। एक बार इसी देशव्यापी कार्यक्रम के लिए प्रिंसीपल ऑफिस में हाजिरी लगवानी पड़ी। अगर अनिमेश को झूठा बेर आगे वाले लौंडो के बैग में रखने का शौक न होता और चलती - फिरती क्लास में लड़कों को कॉपी देने के लिए न मरता तो प्रिंसिपल आफिस में उससे मुलाकात न होती। आफिस में उसकी गैंग जैसे ही दस्तक दी की मेरी आँखें फट के बाहर आने लगी। उन लोगों के दस्तक से हम लोगों में हलचल होने लगी, तभी नाटे सर ने पूरी बात महाभारत कथा की तरह बताई। तब जाकर अंदर की खुशी बाहर ला सकें। मेरी निगाहें उसपर पड़ती और उसकी कहीं और! प्रिंसिपल ऐसे कुर्सी पर आराम फरमाते जैसे बड़ा भारी काम करके आये हो।
अगर उस दिन संविधान में आत्महत्या करना मौलिक अधिकार होता तो उसी समय उसके बालों को अपने गले में फसाकर जान दे देता। उसके सामने पीठ पर दो मुक्के, हाथों पर चार डंडे उपहार स्वरूप मिलें। और मुझे चीड़ इस बात पर हुई कि प्रतिदिन बेर तोड़ने वालियों को बस डांट कर भगा दिया गया।( कम से कम अगर महिला मास्टर न हो तो पुरुष प्रधान देश के पुरुष मास्टर दो डंडे मार ही देते। महिला हो तो लड़को के बराबर।) यह माहौल ही देशभर में एक बड़ा आंदोलन खड़ा करने के लिए काफी था। मार खाने के बाद प्यास जल्दी लग जाती है उस दिन पता चला। हाथों की गरमाहट को पानी से ठंडा कर रहे थे। तभी वह लोग भी आई। ज्यादे चोट तो नही आयीं - उसने कहाँ
नही - मैंने कहाँ
पहली बार बस इतनी ही बात हुई। उसके अगले दिन वह पांचवी क्लास के समय पिछले दरवाजे के पास आकर खड़ी हो गयी। न कुछ बोलती और न ही कुछ इशारा करती। मेरी हिम्मत इतनी नही थी कि प्रिंसिपल क्लास को छोड़कर( और वो भी जो कल हमको मारा था) बाहर आ जाते और पानी पीने के बहाने उसके पीछे - पीछे बात करते करते चले जाते।
शायद उसको उस दिन मेरा निकम्मेपन और बहादुरी का पता चल गया था। जो सपनों में मुझे बड़ा तीस मार ख़ाँ समझती थी। उसमें उसकी गलती नही थी अगर उस दिन उन लड़कियों को भी मार पड़ती तब उसे भी डर का पता चलता।
किस्मत भी उस रेत की तरह है जो जल्दी चाहत के चक्कर मे मुट्टी तो तेज दब जाती, लेकिन रेत उससे और तेज फिसल जाती।
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