~ कमरों का किराया ~
बारह सौ रुपये कमरें का किराया था। जिसका आधा दरवाजा टूटा हुआ, खिड़की पे हिन्दी अखबार ऐसे पसरे थे मानो धन्नो के लिए यही बेस्ट जगह हो। उस दिन पता चला कि हिंदी अखबारों के पाठक किस और किन हालतों में पढ़ते है जिसमें सिर्फ मसाला ही रहता है। कमरें का भूगोलिकरण करते -करते अपने गाँव का भूसा वाला घर याद आ गया जिसमें भूसा को छोड़कर झाले, कीट - फतिंगे और छोटे - मोटे पल पोसुवे जानवर रहा करते थे। यह कमरा बिल्कुल उसी तरह था। इलाहाबाद में कमरों का एक अपना इतिहास है। पता नही अब तक साहित्य वालों ने गाँव देहात से आए लड़को को Transforming India कहकर कोई ज्ञानपीठ क्यों नही लें लेता। वहाँ तो कहावत भी हैं ' यहाँ भगवान को ढूढ़ना आसान है रूम को नही'।
वह दिन भी बहुत अजीब थे सात बजे की एकाउंट की क्लास लेने के चक्कर में कोचिंग जल्दी पहुँच जाता और बिना स्वाद के चाय पीने लगता। इसी उम्मीद में कि सबसे पहला नजर मेरा ही पड़े। उस दिन नारंगी बैंगल और कुर्ता था जो उसके हल्के नीले - काले लेंगिस से मिलता जुलता था। उसके आते ही लौंडे ने ठफरी चालू कर दी, लेकिन वह खिसियानी बिल्ली की तरह अंदर चली गयी ( अगर उसे खिसियानी बिल्ली का पता चल जाता तो उसके स्कूटी पर पीछे बैठकर उसके नाभि तक हाथ न पहुँचता और खुद चलाते समय धड़ाधड़ ब्रेक न मारने को मिलता)। वह हर रोज मैचिंग के ड्रेस पहन - पहन कर आती। पता नही कपड़े उसे अच्छे लगते या कपड़ों ने उसे पसंद कर लिया। एक दिन ऐसे ही कॉफी हाउस में मैंने उसको टोक ही दिया। उसने बातों को ऐसे ध्यान न दिया हो जैसे कोई मंत्री गरीब किसान व मजदूर की बात न समझता हो। यहाँ उसके लिए गरीब यानी पेमेंट बैंकर मैं ही था। वहीं टूटे हुए दरवाजे के पास दो तखत पर रोटी सब्जी खाकर दिनभर की बातें आशु भईया को सब बताता और फिर सो जाता।
उस साझ को मैंने जिन्दगी भर दो बातों के लिए पछताया - पहला की वह हमेशा के लिए जा रही थी और मैंने उसे हमेशा की तरह गले लगाकर माथे पर न चूमा और दूसरा अपने जिगरी यार के मरने पर ना जा सका। उसी लॉज में रहते - रहते कई साल हो गए थे। दीवारों से अब अपनापन और मोह सा लगने लगा था। उस लॉज ने अपना एक परिवार दिया जहाँ भी जरूरत हुई सबने बिना डर के सबका साथ दिया। मैं वह रात आजतक नही भूल पाया हूँ जिसमें एक बूढ़ी औरत के लिए बड़े भईया ने दुकानदार से लड़ाई कर लिया था। बात दरबदर बढ़ने लगी और दुकानदार जोश में होश खोकर राइफल निकाल कर भईया के सामने तान दिया। बातों की बहसाबहसी में राइफल की गोली निकल गयीं और सामने की दीवार पर जाकर धस गयी। लड़ाईयां अब भयंकर शुरू हो गयी। पूरे मार्किट में हल्ला हो गया कि लॉज के लड़कों ने लोकलों से लड़ाई कर लिया। इसी बीच में एक सहपाठी की हाथ टूट गयीं लेकिन हमने उनको खदेड़ ही दिया। थाना अस्पताल और चौकी एक करके उनपे कई धारा लगवाया गया (लॉ किये हुए लड़के किस दिन काम आते)।
यहाँ सवा ग्राम वाला लेखक यह जानना चाहता है कि आखिर क्यों लोग 'कमरों में रहकर एक खुद का कमरा' बना लेते। यह आजादी उसे बिना किसी परछाई के मिली। जो उसे आज यहाँ लिखने पर मजबूर कर दिया।
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