गुरुवार, 12 जुलाई 2018

           ~ अधूरी यात्राएं...पार्ट टू ~


अगर ओपी सर का क्लास न होता तो उसके पानी पीने वाले कार्यक्रम में मैं भी सम्मलित हो जाता और लड़के लड़कियों को ओवरटेक करके एक बार अपनी उपस्थिति उसके आँखों मे दर्ज करवा ही देता। यह अलग बात है कि मैं उससे कुछ कह न सका। ओपी सर! कई बड़े - बड़े फेंकने वाले लौंडो को एक झापड़ में डेस्क के नीचे पहुँचाते जहाँ वह च्युंगम चिपकाते थे।सेक्शन अलग होने के कारण न मुझे वह भाव देती और न मेरे क्लास में बीच मांग फार के आने वाले सलमान खानों को। तमाम काली माई, देई माई और बरम बाबा से अपनी गुहार लगाई, लेकिन बार - बार कॉल ड्राप वाली समस्या यहाँ भी उत्पन्न हो जाती। एक बार मन्नत पूर्ण होने के लिए बताशा के रूप में प्रसाद भी चढ़ाया। उसको स्कूल के बेर बहुत पसंद थे जो उसकी लम्बी वाली दोस्त प्रतिदिन छत से सटे बेर को तोड़ लाती। उनका तीन लोगों का गैंग था और हम लोगों का ढाई।  एक बार इसी देशव्यापी कार्यक्रम के लिए प्रिंसीपल ऑफिस में हाजिरी लगवानी पड़ी। अगर अनिमेश को झूठा बेर आगे वाले लौंडो के बैग में रखने का शौक न होता और चलती - फिरती क्लास में लड़कों को कॉपी देने के लिए न मरता तो प्रिंसिपल आफिस में उससे मुलाकात न होती। आफिस में उसकी गैंग जैसे ही दस्तक दी की मेरी आँखें फट के बाहर आने लगी। उन लोगों के दस्तक से हम लोगों में हलचल होने लगी, तभी नाटे सर ने पूरी बात महाभारत कथा की तरह बताई। तब जाकर अंदर की खुशी बाहर ला सकें। मेरी निगाहें उसपर पड़ती और उसकी कहीं और! प्रिंसिपल ऐसे कुर्सी पर आराम फरमाते जैसे बड़ा भारी काम करके आये हो। 

      अगर उस दिन संविधान में आत्महत्या करना मौलिक अधिकार होता तो उसी समय उसके बालों को अपने गले में फसाकर जान दे देता। उसके सामने पीठ पर दो मुक्के, हाथों पर चार डंडे उपहार स्वरूप मिलें। और मुझे चीड़ इस बात पर हुई कि प्रतिदिन बेर तोड़ने वालियों को बस डांट कर भगा दिया गया।( कम से कम अगर महिला मास्टर न हो तो पुरुष प्रधान देश के पुरुष मास्टर दो डंडे मार ही देते। महिला हो तो लड़को के बराबर।) यह माहौल ही देशभर में एक बड़ा आंदोलन खड़ा करने के लिए काफी था। मार खाने के बाद प्यास जल्दी लग जाती है उस दिन पता चला। हाथों की गरमाहट को पानी से ठंडा कर रहे थे। तभी वह लोग भी आई। ज्यादे चोट तो नही आयीं - उसने कहाँ
नही - मैंने कहाँ 
पहली बार बस इतनी ही बात हुई। उसके अगले दिन वह पांचवी क्लास के समय पिछले दरवाजे के पास आकर खड़ी हो गयी। न कुछ बोलती और न ही कुछ इशारा करती। मेरी हिम्मत इतनी नही थी कि प्रिंसिपल क्लास को छोड़कर( और वो भी जो कल हमको मारा था) बाहर आ जाते और पानी पीने के बहाने उसके पीछे - पीछे बात करते करते चले जाते।
   शायद उसको उस दिन मेरा निकम्मेपन और बहादुरी का पता चल गया था। जो सपनों में मुझे बड़ा तीस मार ख़ाँ समझती थी। उसमें उसकी गलती नही थी अगर उस दिन उन लड़कियों को भी मार पड़ती तब उसे भी डर का पता चलता।

   किस्मत भी उस रेत की तरह है जो जल्दी चाहत के चक्कर मे मुट्टी तो तेज दब जाती, लेकिन रेत उससे और तेज फिसल जाती। 

गुरुवार, 5 जुलाई 2018

                        ~ अधूरी यात्राएं ~ 


भोरहरी में डकनिया तालाब स्टेशन के रेलवे लाइन के पास बैठकर शौचालय करने में बड़ा आंनद देता। जब राजधानी दस - बारह मीटर दूर से सिटी बजाते हुए निकलती और पाछा सुन्न हो जाता। हाई स्कूल पास करने के बाद उससे पहला प्यार हुआ था। नही दूसरा था। छोटे शहरों का प्यार आप से नही तुम से हुआ करता था। यह उसने बताया। उन दिनों एक ऐसी अफवाहें उड़ा करती थी कि जो स्कूल का सबसे खतरनाक मास्टर हो, जो स्कूल में कहीं से भी गुजर जाए तो लौंडो में हलचल हो जाती, किसी के हवाओं में बाल नीचे बैठ जाते तो किसी के कान का पर्दा दर्द करने लगता। स्कूल की दीवारों से बात सुनकर मैंने भी ट्यूशन जॉइन कर लिया। पहली बार उससे वही मुलाकात हुई थी। शायद यह कथन सत्य ही था कि अगर आप उस मास्टर से ट्यूशन लेते है तो वह कम मारता है चाहे गलती आपकी ही क्यों न हो। उन दिनों ट्यूशन फीस चार सौ पचास रुपये हुआ करती थी। स्कूल की हवाईबाजी के लिए ट्यूशन में हाथों पर फुला देने वाले प्रसाद खाने को मिलें। मुझे यह उपहार ही मिला था। उसने उसको खूब गरियाया और अपनों होंठो से मेरे हाथ चूमने लगीं। 

    उसको सिगरा पे घूमना अच्छा लगता था, और मुझें भी। दिन ऐसे ढलता जैसे सिनेमा हॉल में उसके साथ  बैठकर पिक्चर देखते - देखते मेरा हाथ उसकी साइड के गर्दन तक पहुँचते ही पिक्चर ख़त्म होने लगती, लेकिन उसका किस अभी भी बाक़ी रह जाता। उसे चॉकलेट बहुत पसंद थे और मुझे वे। मुझे नही पता कि साप्ताहिक एतवार किसने बनाया होगा, उन दिनों रामपुरी चाकू साथ लिए घूमता था। और जाहिर सी बात है बनाने वालों को स्कूली प्यार हुआ भी नही होगा। यह दिन आम जेलों की तरह न होके तिहाड़ जेल में बदल जाता और माता - पिता इसके सीसीटीवी बन जाते। उसके प्यार में हाई स्कूल पास होना जैसे मानो देश कि सबसे बड़ी परीक्षा पास कर लिया हो और उसने विदेश की। उसके जाने के दो साल बाद इंटर में हाई स्कूल से कम नंबर आया लेकिन यूपी ट्रिपल आईटी में डेढ़ हजार वीं रैंक थी। उन दिनों में भूखहड़ताल करके ढेर सारा पैसा इकट्ठा कर लिया था जो उसके जन्मदिन में गिफ्ट देने के चक्कर में हाथ धोना पड़ा। कई दिन तक रात में नींद भी नही आती थी। शायद उस दिन मुझे लंबा राष्ट्रीय किस भी मिला था। 

      उसके जाने के बाद कितनों की सिगरेट का धुँवा हवाओं में सम्मिलित कर दिया। मेरा मिथक टूट गया और पहला प्यार पाने के लिए वह तमाम मैसेज, दोस्तो से अपनी फरयादी भेजवाई और खुद कितनी बार मिलने की कोशिश की लेकिन उसने कभी भी आँख न मिलाई। क्या वह मुझसे इतना नाराज थी। अगर मुझमें भी कोई सुपरपॉवर होता तो उस समय मे जाकर उस हड़बड़ाई और झुनझुनाहट वाली गलती को मार डालता जिसको आज न झेलता पड़ता। हमारे समाज में प्यार करने वालो को सबसे नीच समझा जाता है। यही से हमारी अधूरी यात्राएं शुरू हो जाती है।


......... डकनिया तालाब स्टेशन कोटा में पड़ता है और सिगरा बनारस में। 

बुधवार, 4 जुलाई 2018

                      ~ कमरों का किराया ~



 बारह सौ रुपये कमरें का किराया था। जिसका आधा दरवाजा टूटा हुआ, खिड़की पे हिन्दी अखबार ऐसे पसरे थे मानो धन्नो के लिए यही बेस्ट जगह हो। उस दिन पता चला कि हिंदी अखबारों के पाठक किस और किन हालतों में पढ़ते है जिसमें सिर्फ मसाला ही रहता है। कमरें का भूगोलिकरण करते -करते अपने गाँव का भूसा वाला घर याद आ गया जिसमें भूसा को छोड़कर झाले, कीट - फतिंगे और छोटे - मोटे पल पोसुवे जानवर रहा करते थे। यह कमरा बिल्कुल उसी तरह था। इलाहाबाद में कमरों का एक अपना इतिहास है। पता नही अब तक साहित्य वालों ने गाँव देहात से आए लड़को को Transforming India कहकर कोई ज्ञानपीठ क्यों नही लें लेता। वहाँ तो कहावत भी हैं ' यहाँ भगवान को ढूढ़ना आसान है रूम को नही'। 

          
      वह दिन भी बहुत अजीब थे सात बजे की एकाउंट की क्लास लेने के चक्कर में कोचिंग जल्दी पहुँच जाता और बिना स्वाद के चाय पीने लगता। इसी उम्मीद में कि सबसे पहला नजर मेरा ही पड़े। उस दिन नारंगी बैंगल और कुर्ता था जो उसके हल्के नीले - काले लेंगिस से मिलता जुलता था। उसके आते ही लौंडे ने ठफरी चालू कर दी, लेकिन वह खिसियानी बिल्ली की तरह अंदर चली गयी ( अगर उसे खिसियानी बिल्ली का पता चल जाता तो उसके स्कूटी पर पीछे बैठकर उसके नाभि तक हाथ न पहुँचता और खुद चलाते समय धड़ाधड़ ब्रेक न मारने को मिलता)। वह हर रोज मैचिंग के ड्रेस पहन - पहन कर आती। पता नही कपड़े उसे अच्छे लगते या कपड़ों ने उसे पसंद कर लिया।  एक दिन ऐसे ही कॉफी हाउस में मैंने उसको टोक ही दिया। उसने बातों को ऐसे ध्यान न दिया हो जैसे कोई मंत्री गरीब किसान व मजदूर की बात न समझता हो। यहाँ उसके लिए गरीब यानी पेमेंट बैंकर मैं ही था। वहीं टूटे हुए दरवाजे के पास दो तखत पर रोटी सब्जी खाकर दिनभर की बातें आशु भईया को सब बताता और फिर सो जाता। 


      उस साझ को मैंने जिन्दगी भर दो बातों के लिए पछताया - पहला की वह हमेशा के लिए जा रही थी और मैंने उसे हमेशा की तरह गले लगाकर माथे पर न चूमा और दूसरा अपने जिगरी यार के मरने पर ना जा सका। उसी लॉज में रहते - रहते कई साल हो गए थे। दीवारों से अब अपनापन और मोह सा लगने लगा था। उस लॉज ने अपना एक परिवार दिया जहाँ भी जरूरत हुई सबने बिना डर के सबका साथ दिया।  मैं वह रात आजतक नही भूल पाया हूँ जिसमें एक बूढ़ी औरत के लिए बड़े भईया ने दुकानदार से लड़ाई कर लिया था। बात दरबदर बढ़ने लगी और दुकानदार जोश में होश खोकर राइफल निकाल कर भईया के सामने तान दिया। बातों की बहसाबहसी में राइफल की गोली निकल गयीं और सामने की दीवार पर जाकर धस गयी। लड़ाईयां अब भयंकर शुरू हो गयी। पूरे मार्किट में हल्ला हो गया कि लॉज के लड़कों ने लोकलों से लड़ाई कर लिया। इसी बीच में एक सहपाठी की हाथ टूट गयीं लेकिन हमने उनको खदेड़ ही दिया। थाना अस्पताल और चौकी एक करके उनपे कई धारा लगवाया गया (लॉ किये हुए लड़के किस दिन काम आते)। 

  
     यहाँ सवा ग्राम वाला लेखक यह जानना चाहता है कि आखिर क्यों लोग 'कमरों में रहकर एक खुद का कमरा' बना लेते। यह आजादी उसे बिना किसी परछाई के मिली। जो उसे आज यहाँ लिखने पर मजबूर कर दिया। 
     


मंगलवार, 3 जुलाई 2018

खेत खलिहान

                          खेत खलिहान 



कुछ दिनों बाद खेतों में अब धान की रोपनी शुरू होने वाली है जिसके लिए किसान अब अपने - अपने खेतों में पानी का लेव लगा रहे होंगे ताकि धान का बिया खेत मे अच्छे से गड़ सके। जिन राज्यों में मानसून अच्छी हुई होगी, वहाँ के किसानों के लिए राहत होंगी और वे बिना भागदौड़ के अपने - अपने खेतों की अच्छी तरह से सिंचाई कर सकेंगे। कई जगह खेतों में पानी ट्यूबल या नहरों से भी पहुचाये जाते है और कई ऐसे भी जगहें है जहाँ डीजल लगे मोटर से पानी की सिंचाई होती है( एक ये भी कारण है कि किसानी इतनी महंगी हो जाती हैं)। इसमें अकूत मेहनत लगी रहती है किसानी के लिए चिलचिलाती धूप हो या जाड़े की हाड़ गलाने वाली ठंडी या बिजली गिरती हुई बारिश हो सबमें खड़े होकर अपने फसल को देखना सबसे मुश्किल रहता है।

     जब भी बाढ़ या बिन मौसम बारिश से अपने उगे हुए फसलों को धरती पर गिरा देखते है सीने की आग दहल उठती है। हमने लहलहाती फसलों को गिरते देखा, जो फसल कट गई उसको सड़ते देखा। खेती - किसानी करते हुए लोगों ने धान को अपनी बेटी और मक्का को अपना बेटा मान लिया है। इसी उम्मीद में कि अगली बार फिर से नए अंदाज में इठलाती, बलखाती फसलों का नया शेप पैदा करूँगा। 

   सरकारों ने इनका हक़ मारने लिए अपना वजीफा बड़ा कर लिया। बिना किसान और गरीब की बात किये आजतक कोई नेता नही बन सके, लेकिन उनकी बातें आजतक न सुनी गयीं। 

सूखते कपड़ो का छत!

छतों पर सूखते कपड़ो को देखकर ऐसा लगता है जैसे छत बनाये ही इसीलिए जाते हैं ताकि छतों पर कपड़े सुखाए जा सकें। जाड़ा के मौसम में तो भारत के लगभग स...