सोमवार, 14 अक्टूबर 2019

अर्नेस्टो गेवारा दे ला सरना


"घुटने टेककर ज़िंदगी जीने से बेहतर मैं मरना पसंद करूंगा"

अर्नेस्टो गुयेवारा लिंच और सेलिया दे ला सरना के घर पहला बेटा जन्म लिया, रोजारियो के सेन्टेनारियो के अस्पताल में। तारीख थी 14 जून 1928 और समय था शाम का 3:05। अपने माता-पिता के नाम पर ही अपना नाम रखा, 'अर्नेस्टो गेवारा दे ला सरना'। जो कई वर्षों बाद लैटिन अमेरिका के लिए एक नाम खटकने लगा। "चे"

   18 अक्टूबर, 1967 को शाम 8 बजे लाखों की तादाद में क्यूबा की जनता हवाना के उस क्रांति चौक पर जुटी जहाँ उसने न जाने कितनी बार चे की ओजस्वी वाणी को सुनते हुए उनका अभिवादन किया था। उस दिन वह धार-धार आँसू रोते, निःशब्द, साँस रोके फिदेल को सुन रही थी जो लैटिन अमेरिका जनता की आजादी और खुशहाली के लिए क्रांतिकारी मुक्ति - संघर्ष में चे के अकल्पनीय हठीले शौर्य और अविस्मरणीय शहादत की दास्तान सुना रहे थे। फिदेल ने वहाँ उपस्थित जन- समुद्र से, समूचे क्यूबा से, सम्पूर्ण मानवता से सवाल किया ' हम अपने बच्चों को क्या बनाएँगे ?' चारों दिशाओं से एक ही जवाब गूँजा - 'हम उन्हें चे बनाएँगे' - 'हम उन्हें चे बनाएँगे।' क्रांति के दीवाने नौजवानों का ध्येय वाक्य बन गया 'हम चे बनेंगे।'

   तभी पाब्लो नेरुदा की एक कविता बीच में आ जाती है

 मेरी छाती पर दस्तक देने मत आना, मैं दूर जा चुका हूँ।
 विचरो मेरे साम्राज्य में मनमर्जी से
मेरी गैर मौजूदगी में।
आलीशान विशाल घर है मेरी गैर मौजूदगी
टहलते रहो इसकी दीवारों के बीच
और टांगो पेंटिगें हवा में।
इतना पारदर्शी घर है गैर मौजूदगी
खुद के जीवन बिना ही देखूँगा तुम्हें जीते
अगर मैंने तुम्हें तकलीफ में देखा, मेरे प्रिय
मैं फिर-फिर मर जाऊँगा।

जब वह अपनी गर्लफ्रैंड चिचिना के माँ - बाप के साथ डिनर टेबल डिनर आंनद ले रहे थे तो बाकी लोग विश्वयुद्ध और विंस्टन चर्चिल की मेघा और क्षमता का दीवानगी की हद तक कायल थे। हर सदस्य के पास चर्चिल के गुणगान के लिए खुद को जोड़ते हुए कोई न कोई किस्सा था जिसे वे अपनी शान और भोजन, दोनों के स्वाद के चटकारे लेकर सुना रहे थे और सुनने वाले आह - वाह कर रहे थे, सिवाय मेरे। मैं बड़ी मुश्किल से खुद पर काबू रखते हुए अपने को खाने में उलझाए हुए था। आखिरकार मेरे सब्र का बाँध टूट ही गया। सर झुकाकर खाना खाते हुए मेरी छुरी जैसी धार वाली जबान चल ही गई, ' चर्चिल एक धूर्त धोखेबाज राजनीतिज्ञ के अलावा है क्या'। उस घर में मेरा वह अंतिम दिन था। मगर मैं और चिचिना उसके बाद छिप - छिपकर मिलते रहे।

चे कहते हैं कि भारत में ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन के बहरे कानों को सुनाने और ब्रिटिश राज में भारत की दुर्दशा के प्रति पूरी दुनिया का ध्यान दिलाने के लिए करीब एक दशक पहले शहीदे - आजम भगतसिंह ने भारतीय संसद के अंदर बम विस्फोट किया था। ताकि पूरी दुनिया में भारत के प्रति हो रही मानवीय दुर्दशा और जातीय हिंसा को देखा जा सकें।

आठ अक्टूबर का सूरज निकलने से पहले सीआईए के अमेरिकी - क्यूबाई एजेंटों और गुरिल्लारोधी सेना विशेषज्ञों की देखरेख में प्रशिक्षित बोलिवियाई आर्मी रेंजर्स कैप्टन गैरी प्राडो सालमन की कमान में अलयूरो पहाड़ी पर कमांड पोस्ट लगाने के बाद नीचे बीहड़ के दर्रे ब्राडा डेल यूरो में घुसने और निकलने के रास्तों पर पहरा बैठा चुके थे। चे ने अपने दस्ते को तीन टुकड़ियों में बाँटकर पोजिशन लगाई और कुछ घंटों बाद गुरिल्ला टुकड़ियों का एक दूसरे से संपर्क टूट गया। चे की टुकड़ी ने, जिसमें उनको लेकर सात लड़ाके थे। गोलीबारी एक - दूसरे के तरफ से लगातार चल रही थी। चे की M-2 कार्बाइन बराबर आग उगल रही थी। दुश्मनों की तरफ से एक गोली कार्बाइन की नाल पर आ लगी और कार्बाइन को बेकाम कर गई। पिस्तौल की मैगजीन पहले ही गुम हो चुकी थी। चे पूरी तरह निहत्थे हो चुके थे। तभी एक और गोली सनसनाती आकर बाईं जाँघ में पैबस्त हो गयी और तीसरी उनकी कैम्प को चीरती निकल गयी। घायल जाँघ के चलते चे अपने बूते चल पाने में लाचार हो गए। विली ने एक हाथ में अपनी मशीनगन थामी, दूसरी से अपने कमांडेंट को सहारा दिया और दोनों वहाँ से निकलने में एक खड्डे का किनारा पकड़कर चढ़ने लगे। ऊपर कैप्टन प्राडो की प्लाटून के तीन फौजी घात लगाए थे जिनकी नजर उन पर पड़ गयी। जैसे ही चे और विली ऊपर आगे बढ़े, पास की झाड़ी से सार्जेंट बर्नाडिर्नो हुआंका दो और फौजियों के साथ बाहर निकला और गन तानकर दोनों को अपने हथियार गिराकर समर्पण के लिए ललकारा। चे गोली चलाने की हालात में नहीं थे। विली भी चे को सँभाले होने के चलते एक हाथ से मशीनगन से तुरंत निशाना नहीं ले सके। या फिर उस हालात में गोली न चलाना बेहतर समझा हो। निशाना लेने के बावजूद हुआंका और उसके सिपाहियों के हाथ कँपकँपा रहे थे। वे काफी नर्वस और असमंजस में थे। तभी विली ने अपनी बंदूक जमीन पर डाली और कड़कती आवाज में कहा, ' खबरदार, ये हैं नेशनल लिबरेशन आर्मी के कमांडर चे गुवारा, इनके साथ इज्जत से पेश आना।' कहा यह भी जाता है कि खुद चे ने हुआंका का जवाब दिया था, गोली चलाने की जुर्रत मत करना, मैं चे गुवारा हूँ और मुर्दा की बजाय जिन्दा तुम लोगों के लिए ज्यादा कीमती हूँ।'


  पकड़कर लाएं गए चे से जब ले. कर्नल सेलीच सवाल पूछा - 'आप क्यूबाई हो या अर्जेन्टीनी ?' 'मैं क्यूबाई, अर्जेन्टीनी, बोलीवियाई, पेरूवियाई, इक्वाडोरियन... तुम समझ रहे हो न, सभी कुछ हूँ।' 'आप हमारे देश में क्यों आए।' 'क्या तुम देख नहीं पा रहे हो यहाँ किसान किस हालात में हैं ? वे करीब - करीब आदिम जमाने में जी रहे हैं, कलेजा चीर देने वाली दरिद्रता में, रहने - खाने - पकाने सभी कुछ के लिए बमुश्किल एक झोपड़ी, बदन पर कपड़ा नहीं, जैसे बेजुबान जानवरों की तरह परित्यक्त हों'। सेलिच ने पलटकर वार किया, ' मगर क्यूबा में भी तो यही सब कुछ है', चे ने जवाब दिया,' सरासर झूठ, इस बात से इनकार नहीं कि वहाँ अभी भी गरीबी है मगर वहाँ किसानों के पास प्रगति की उम्मीद है। यहाँ का किसान बिना किसी उम्मीद, बिना किसी सपने के जीता है, जैसे पैदा होता है उन्ही हालात में दम तोड़ देता है - अपनी मानवीय दशाओं में तनिक भी सुधार देखे बग़ैर।

सीआईए एजेंट फेलिक्स और बोलीवियाई सरकार की उन तमाम कोशिश अनन्तः सफल सिद्ध हुई। रोड्रिग्ज वह झोपड़ी में घुसा( जिसमें चे को रखा गया था) तो उसने चे से पूछा, क्या आप अपने परिवार के लिए कोई संदेश भेजना चाहते हैं। तो चे ने कहाँ," फिदेल से कहना, इस असफलता का मतलब क्रांति का अन्त हरगिज नहीं है, यह निश्चित रूप से यहाँ नहीं तो कहीं और विजय का परचम लहराएगी। एलिदा (पत्नी) से कहना यह सब भूल जाएं, फिर से विवाह करे, खुश रहे, बच्चों के पढ़ने - लिखने का हमेशा ध्यान रखती रहे। फौजियों से कहना, निशाना सटीक लगाएँ।" यही चे का अंतिम शब्द था। इसके बाद 9 अक्टूबर, 1967 को 1 बजकर 10 मिनट पर उन्तालीस साल की उम्र में चे गुवारा क्रान्तिवेदी पर शहादत का शिखरध्वज बनकर अमर हो गए।



बुधवार, 22 मई 2019

पंडित राजकुमार शुक्ल!



27 दिसंबर 1916 का दिन था। हल्की - हल्की धूप खिली थी। लखनऊ के मोतीनगर स्थित नवाब वाजिद अली शाह के बगीचे में शामियाने से बने स्टेज पर बिहार का गँवई किसान धीरे - धीरे चढ़ रहा था। कांग्रेस के राष्ट्रीय अधिवेशन में मौजूद तकरीबन 2300 प्रतिनिधियों के बीच उसे अपने इलाके के किसानों की दुख-दर्द की दास्तान सुनानी थी। उसके सामने बैठे लोग पूरे देश से आए हुए थे। और यह गँवई किसान जब बिहार के एक बड़े वकील और जाने -माने राजनेता ब्रजकिशोर प्रसाद के बाद उसे अपना प्रस्ताव/भाषण रखना था इस अधिवेशन में। उस गँवई किसान को ठीक से हिंदी भी नही आती थी लेकिन तभी भी उसने अपनी बात इस प्रकार से रखी। 

" इस अधिवेशन में देश के कोने - कोने से पहुँचे सभी लोगों को चम्पारण की धरती से आए इस किसान राजकुमार शुक्ल का राम - राम। आज हम आप लोगों को अपने इलाके के किसानों की व्यथा सुनाने जा रहे हैं। हमारे इलाके में विलायती अंगरेज नील की खेती करवाते हैं। इन निलहे अंगरेजों के साथ लम्बे समय से हमारे यहाँ के किसानों - मजदूरों का तालमेल बैठ नहीं रह है। इन अंगरेजों ने नील की खेती कराने के लिए रामनगर और बेतिया के राजा से जमीन लीज पर ली है। उनकी शर्त के मुताबिक हम लोगों को हर एक बिगहा जमीन में से तीन कट्ठा को नील उगाने के नाम पर अलग रख देना पड़ता है। हालाँकि ये अंगरेज लोग इतने से भी खुश नहीं होते। वे गरीब रैयतों से मुफ्त में मजदूरी तो कराते ही हैं, उनके साथ बुरा बर्ताव भी करते हैं। वे लोग इतने ताकतवर हैं कि इलाके के दीवानी और फौजदारी मुकदमों का फैसला भी खुद कर लेते हैं और जिसको जैसा जी में आए वैसी सजा सुना देते हैं। हमलोगों ने सरकार से कई बार अनुरोध किया है कि वह इस मामले की जाँच कराए। मगर बार - बार कहने पर भी सरकार इस अनुरोध पर ध्यान नहीं देती है। 1908 ईस्वी में इसी बात को लेकर चम्पारण में बड़ा बावेला मचा था। उस वक्त बंगाल की सरकार ने एक अफसर को इस मामले की जाँच करने के लिए भेजा भी। लेकिन उस जाँच की रिपोर्ट को सार्वजनिक नहीं किया गया और उल्टे सैकड़ों किसानों को जेल भेज दिया गया। हम भी चम्पारण के ही रैयत हैं और हमको मालूम नहीं कि यहाँ से जब हम लौटेंगे तो यहाँ अपनी दुख भरी कहानी सुनानें की सजा हमें क्या दी जाएगी।" 

इतना कहकर वह चुप हो गया। इस भाषण को सुनकर अधिवेशन के टेंट में बैठे प्रतिभागी शेम - शेम कहने लगे। यह भाषण गँवई किसान राजकुमार शुक्ल ने दिया था। जिनकी पुण्यतिथि 20 मई को थी। 

उस अधिवेशन में बैठे तमाम लोगों को वह गँवई किसान देख रहा था कि किसे चम्पारण ले कर जाया जा सकें। उसकी निगाह वहाँ बैठे लोकमान्य तिलक, मदनमोहन मालवीय और मोहम्मद अली जिन्ना जैसे नेताओं के चेहरे से गुजरती हुई मोहनदास करमचंद गांधी नामक एक नेता पर टिक गई। जो कुछ - कुछ किसान जैसे दिख रहे थे। वे गुजरात की काठियावाड़ी परिधान पहने बैठे थे और लगातार नंगे पाँव चलने की वजह से उनके पाँव सूज गए थे। वह सोचने लगा, और कोई चले-न-चले इनको तो किसी भी सूरत में अपने साथ चम्पारण ले जाना है। उसे पिछले साल कानपुर से छपने वाले अखबार "प्रताप" के युवा सम्पादक गणेश शंकर विद्यार्थी की बात याद आ गई। उन्होंने कहाँ था, " पंडित जी, गांधी को पकड़कर चम्पारण ले जाइए। उन्हीं से काम बनेगा। दक्षिण अफ्रीका में इस गुजराती वकील ने बड़ा काम किया है। इसको अंगरेजों को हराना आता है।"

फिर वही तम्बू में रात के समय बाबू ब्रजकिशोर प्रसाद के साथ वह गँवई किसान गांधी से मिलकर वहाँ की सारी परेशानियां व दुख - दर्द बताया। जिससे गांधी वहाँ चलने पर मजबूर हुए। और जब गांधी चम्पारण गए तो सारा इतिहास बदल गया। नील किसानों की समस्याएं दूर हुई और भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की नींव वही पड़ गईं। 
                          चम्पारण में गांधी

अगर चम्पारण का यह गँवई किसान न रहता तो पता नही क्या होता। 20 मई को इस किसाननेता की पुण्यतिथि थी जिसने चम्पारण में नील किसानों की मुक्ति दिलाने में एक बड़ी महत्वपूर्ण भूमिका अदा की। 




गुरुवार, 16 मई 2019

गाजीपुर चुनाव विश्लेषण! पार्ट 2

 ऐसा क्या हो गया कि गाजीपुर सीट बसपा के खाते में चली गयीं। जो लोकसभा सीट सपा बहुलता की मानी जाती रही अचानक गठबंधन में वो सीट बसपा के हाथों में चली गयी। सांसद के तौर पर सपा यहाँ अपना वर्चस्व पहले ही जमा चुकी हैं सन 2004 और 09 में। तो फिर ये सीट बसपा के खाते में क्यों चली गयी। क्या सपा के अच्छे उम्मीदवार नहीं हैं। हैं न।

अब आतें हैं इस रणनीति पर कि जो मायावती अपने मुख्यमंत्री कार्यकाल के दौरान अंसारी बंधुओं को गुंडा, बदमाश व माफ़िया बताती रहीं और अपने कार्यकाल में इनके उभरते हाथ पर लगाम लगा कर इनके अपराधीकरण को ख़त्म कर दिया। फिर ऐसा क्या हो गया कि कुछ वर्षों बाद अपने पार्टी में शामिल करके इन्हें लोकसभा में गाजीपुर सीट दे दिया। आख़िर टिकट देने में क्या देखा गया। ईमानदारी, नेक इंसान, सामाजिक व्यक्ति ये तो हैं नही। और फिर क्या देखा गया। क्या ये अपने क्षेत्र में काम करवा सकतें हैं( इससे पहले जब अफ़ज़ाल अंसारी सांसद और विधायक चुने गए थे तो काम तो कुछ करवाएं नहीं थे)।

क्या अखिलेश यादव की भी रणनीति यही कह रही थी कि हम इन माफियाओं को टिकट देकर लोकसभा पहुचाएंगे। जब विधानसभा का चुनाव 2017 में हो रहा था तो मुख़्तार अंसारी को सपा से टिकट देने की बात चल रही थी लेकिन अकेले अखिलेश यादव ने इसका विरोध किया था। अच्छा भी किया था टिकट न देकर। लेकिन अब ऐसा क्या हो गया कि उनके बड़े भाई को गठबंधन का उम्मीदवार बनाया बसपा से और वो भी सपा बहुलता वाली सीट पर। क्या अब उनको भी माफियाओं से गठबंधन करने से सहजता हो रहीं है। और अफ़ज़ाल अंसारी के लिए गाजीपुर में रैली भी संबोधित कर चुके हैं। क्या अखिलेश यादव को भी अब ये लगने लगा हैं कि अफ़ज़ाल अंसारी अपने क्षेत्र का विकास करेंगे। क्या वे नहीं जानते कि इनका और इनके भाईयों का नाम हत्याओं और दंगो में दर्ज हैं। क्या वे नहीं जानते कि बीजेपी विधायक समेत सात लोगों की हत्या में उनके भाई पर मुकदमा दर्ज हैं। अफ़ज़ाल अंसारी पर भी कई मुकदमे दर्ज हैं। तो क्या वे विकास बंदूक और डर के दम करवाना चाहतें हैं। टिकट देकर तो यही लगता हैं।

अखिलेश यादव की जो छवि साफ दिख रही थी अब वो धूमिल नजर आ रहीं है। गाजीपुर में गठबंधन के उम्मीदवार को टिकट देकर तो यही लगता हैं। उन्हें कोई दूसरा उम्मीदवार भी तो मिल सकता था। बहुतेरे हैं बसपा के नेता गाजीपुर में। उन्हें भी टिकट दिया जा सकता था। लेकिन अफ़ज़ाल अंसारी को ही क्यों?

तो, मायावती और अखिलेश यादव ने साम्प्रदायिकता फैलाने वाले को टिकट देकर ये साफ कर दिया हैं कि वे क्या सोचतें हैं। साम्प्रदायिकता के बारे में। 

शुक्रवार, 10 मई 2019

गाजीपुर चुनाव विश्लेषण!



वर्तमान समय में बीजेपी के उम्मीदवार मनोज सिन्हा और सपा + बसपा के गठबंधन के उम्मीदवार अफ़ज़ाल अंसारी हैं। 2014 में मनोज सिन्हा चुनाव जीतकर केंद्र में मंत्री बने थे। रेल राज्य और स्वतंत्र दूरसंचार मंत्री थे। इससे पहले भी 2 बार सांसद रह चुके हैं।
अगर जमीनी हकीकत को समझे तो यहाँ मनोज सिन्हा ने रेल और दूरसंचार में बहुत ढेरो काम करवाया हैं जो जिले में आजतक नही हो सका था। लेकिन जातिगत रणनीति की वजह से अभी ये सीट इधर-उधर हिलोरें मार रहीं है। आप खुद जमीनी पड़ताल कर सकतें हैं। अभी कुछ दिन पहले ही एक वीडियो वायरल हुआ था जिसमें मनोज सिन्हा कह रहे थे कि अगर उनके कार्यकर्त्ता पर किसी ने उंगली उठायी तो उसकी उंगली सलामत नहीं रहेगी। हालांकि सत्य सही है कि खुद उनके भतीजे और बीजेपी विधायक समेत दर्जनों हत्याएं हो चुकी हैं लेकिन अभी तक उन सभी का कुछ हुआ नहीं।

और उधर बाहुबली मुख़्तार अंसारी के भाई अफ़ज़ाल अंसारी हैं। जिनका गाजीपुर के इतिहास में हत्या,छिनैती, लूट, वसूली, कमीशन बाजी का वजूद रहा है। अफ़ज़ाल अंसारी सांसद और विधायक दोनों रह चुके हैं लेकिन काम कुछ भी नही करवाया है अपने कार्यकाल के दौरान। आप गाजीपुर में किसी से भी पूछ सकते है। और इनके परदादा मत जाइएगा। वे अच्छे थे लेकिन ये नही हैं। ये माफिया हैं।

चुनाव बस जीत हार की नहीं हो रही है। गाजीपुर में शांति चाहिए और इसके साथ - साथ यहाँ विकास भी चाहिए। जो अफ़ज़ाल अंसारी नही करवा सकते। अगर यह व्यक्ति चुनाव जीत जाता है तो भय, असुरक्षा का माहौल और दबंगई फिर से शुरू हो जाएगी।

सोचना आपको हैं? कि वोट किसे दें। आप खुद सोचें।

शनिवार, 6 अप्रैल 2019

जमीनी मुद्दों से गायब होता चुनाव!

                     ( यह कूड़ा मिलन विहार का है)
                      ( ये भी! मिलन विहार बुराड़ी में पड़ता है)
ये तीनो फ़ोटो दिल्ली के बुराड़ी क्षेत्र के मिलन विहार से ली गयीं हैं। स्लम बस्ती की फ़ोटो है जिसका "विकास" कही लापता हो गया है। अरविंद केजरीवाल कहते है कि हमने दिल्ली में विकास किया है लेकिन यहाँ तो नही दिख रहा है। क्या ये भी केंद्र सरकार के अंतर्गत आता है? दिल्ली में कचरा बहुत है जहाँ जाईये वहाँ कचरा ही कचरा है अधिकतम जगहों पर।

अब तो चुनाव आ गया है तो इसपर नेताजी का ध्यान कहाँ से जाएगा। अभी तो उनका पूरा ध्यान आईटी सेल और जोड़-घटाव,गठबंधन पे होगा। और असली मुद्दों पे चुनाव कौन लड़ता है जी। जो ये लड़ जाएं।

जब भी चुनाव की बात करतें है तो सबसे पहले यही ध्यान आता है कि हमारे गली-मोहल्ले-गाँव-शहर की खराब व्यवस्था( जैसे - स्कूल, अस्पताल, कॉलेज, बदबूदार नालियां, किसानों की समस्याएं, फसलों का मूल्य न मिलना, कचहरी में काम ठीक से होना, भ्रष्टाचार कम होना)। इत्यादि इन सभी बातों को लेकर नेता अपने- अपने रैलियों में इसका मुद्दा उठाएंगे और उनकी सरकार बनने पर इसका निदान जल्द से जल्द कर सकेंगे। लेकिन होता इसका उल्टा है।

 हमने पहले विकास शब्द का इस्तेमाल चुनावों में होता नही सुना या देखा। पहले इसको शिक्षा, पानी, बिजली,सड़क,गरीबी, अस्पताल और भी बहुत सारे हैं जिसको नेता बारी-बारी से गिनाते थे और कहते थे कि ये हटाओ, वो हटाओ और "गरीबी हटाओ"(जो हटा नही अब तक)। अब आप कहीं भी इन सब भागो को नही सुन सकते क्योंकि अब इन सबका समावेशीकरण "विकास" नामक वस्तु में हो गया है। अब हर जगह नेता विकास विकास का नारा बोलते रहते है और जनता से पूछते है कि बताईये विकास हुआ कि नही हुआ। बताईये न? 

शुक्रवार, 29 मार्च 2019

मोटर साइकिल!


उसकी जिद थी कि आखिरी बार आधी रात को आंखों में आँखे डालकर विदा लें। ताकि हमारे बाद, हमसे पहले या हो रहे मोहब्बत की परवान पर कोई शक़ न करें। उस रात मोटर साइकिल हवा में थी आँखों में बहता पानी था दिमाग भन्नाया था कलेजा धधक रहा था।

 आमतौर पर सवा-ग्यारह पर सोने वाला यह लड़का अपनी मोहब्बत से मिलने स्टेशन जा रहा था। उसे फ्रूटी और आइस क्रीम गोपाल चचा की दुकान की बहुत पसंद थी। जो छूट गया अब। जो नही छूटा वह उसका नीला वाला कुर्ता था जो कटरा में खरीदा था डिस्काउंट पर। रात 1:20 की ट्रेन थी। मोटर साइकिल हवा में थी। उससे मिलने की बेचैनी बढ़ रही थी। 

कई दिन पहले कंपनी बाग के घास पर बैठे -बैठे उसके हाथों को अपने हाथों में लेते हुए केदारनाथ सिंह जी एक पंक्ति कही थी। 

"उसका हाथ
अपने हाथ में
लेते हुए मैंने सोचा
दुनिया को 
हाथ की तरह गर्म
और सुंदर होना चाहिए।"

वाह! तुमने लिखी है क्या?
नहीं... केदारनाथ सिंह जी की हैं। 
देख लेना यही हाथ हम लोगों का सदा के लिए जुड़ जाएगा। 

शहर - इलाहाबाद 

शुक्रवार, 1 फ़रवरी 2019

गांधी के नाम पत्र!

मान्यवर महात्मा

  'किस्सा सुनते हो रोज औरों के
  आज मेरी भी दास्तान सुनो'


 " आपने उस अनहोनी को प्रत्क्षय का कार्यरूप में परिणत कर दिखाया, जिसे टॉल्सटाय और महात्मा केवल विचारा करतें थे। उसी आशा और विश्वास के वशीभूत होकर हम आपके निकट अपनी राम कहानी सुनाने के लिए तैयार हैं। हमारी दुःख भरी कहानी दक्षिण अफ्रीका के अत्याचार से, जो आप और आपके अनुयायी वरी सत्याग्रही बहनों और भाइयों के साथ हुआ, कहीं अधिक है। हम अपना वह दुःख जो हमारी 19 लाख आत्माओं के हृदय पर बीत रहा है, सुनाकर आपके कोमल हृदय को दुखित करना उचित नहीं समझते हैं। बस केवल इतनी ही प्रार्थना है कि आप स्वयं आकर अपनी आँखों से देख लीजिए, तब आपको अच्छी तरह विश्वास हो जाएगा कि भारतवर्ष के एक कोने में यहाँ की प्रजा, जिसको ब्रिटिश छत्र की सुशीतल छाया में रहने का अभिमान प्राप्त है, किस प्रकार के कष्ट सहकर पशुवत जीवन व्यतीत कर रही है। हम और अधिक न लिखकर आपका ध्यान उस प्रतिज्ञा की ओर आकृष्ट करना चाहतें हैं, जो लखनऊ कांग्रेस के समय और फिर वहाँ से लौटते समय कानपुर में आपने की थी, अर्थात मार्च - अप्रैल महीने में चंपारण आऊँगा, बस अब समय आ गया है। श्रीमान अपनी प्रतिज्ञा को पूर्ण करें। चम्पारण की 19 लाख दुःखी प्रजा श्रीमान के चरण - कमल के दर्शन की टकटकी लगाए बैठी है। और उन्हें आशा ही नहीं पूर्ण विश्वास है कि जिस प्रकार भगवान श्री रामचन्द्र के चरण स्पर्श से अहिल्या तर गई, उसी प्रकार श्रीमान के चम्पारण में पैर रखते ही हम 19 लाख प्रजाओं का उद्धार हो जाएगा।"

बेतिया।                                       श्रीमान का दर्शनाभिलाषी
27 फरवरी, 1917                         राजकुमार शुक्ल


  यह वही पत्र था जिसे पढ़कर एमके गांधी ने चम्पारण जाने की अपनी योजना को तठस्थ और सुदृढ़ बना लिया। यह पत्र तो राजकुमार शुक्ल के नाम से लिखा गया था लेकिन यह पत्र "प्रताप" अखबार के पत्रकार पीर मोहम्मद मुनीस ने लिखा था। राजकुमार शुक्ल उतने पढ़े - लिखें नहीं थे जो एमके गांधी को इतना मार्मिक और आने के लिए विवश कर सकें। 

  और जब गांधी चम्पारण पहुँचे तो नील का दाग मिट गया। और यह हम सब जानते है। और यह साल तो गांधी की 150वीं जयंती है अक्टूबर 2 को। 

बुधवार, 23 जनवरी 2019

पाब्लो नेरुदा - आज तो आज है और बीता कल बीत गया, यह तय है।

                  उत्सव


आज तो आज है, कल आ पहुँचा है
न जाने कितने - कैसे अंधेरों से बना:
हमें नहीं मालूम
इस नयी जन्मी दुनिया में उजाला है भी या नहीं:
आओ इसे आँच दें, इसे ठंड दें,
जब तक कि यह सुनहरी और भूरी न हो जाए
अनाज के पके कठोर दानों की तरह:
कि हर कोई, नवजात, त्रासदियों से बचे लोग,
           अंधे, मूक-बधिर, विकलांग, लुटे-पिटे, सभी,

देख सकें और कह सकें
कि वे जी सकतें हैं आजाद घूम सकतें हैं,
कि वे चख सकतें हैं, रख सकते हैं भविष्य के फल,
जो उस वर्तमान साम्रज्य में उपजेंगे जिसमें हमने
अन्वेषी को भी वही अधिकार दिया है जो महारानी को,
जिज्ञासु खगोली को भी उतना ही जितना पुरातन खेतिहर को,
उन मधुबालाओं को भी जो छत्ता बनाने के काम में जुटी हैं
और सबसे बढ़कर उनको जो भी अभी-अभी आए हैं,
वे लोग जो बढ़ते ही जाएंगे
नयी ध्वजाओं के साथ, जो जन्मी थीं लहू और पसीने की हर बूंद से
आज तो आज है और बीता कल बीत गया, यह तय है।
आज आने वाला कल भी है, और किसी गुजरे ठंडे साल के साथ
मैंने महसूस किया वह साल जो मेरे साथ छूट गया
और मैंने अपने साथ लेता गया।
इस बारे में कोई संशय नहीं। अक्सर मेरा कंकाल
हवा और बरसात झेलती वज्र हुई हड्डियों जैसे शब्दों से बनता है
और मैं वर्तमान का उत्सव मनाता हूँ अपने पीछे
किसी गीत या गवाही के बजाय,
शब्दों का एक हठीला, टिकाऊ कंकाल छोड़कर।

गुरुवार, 17 जनवरी 2019

चे गेवारा और चाय!


मैं जानता हूँ। जानता हूँ मैं!
अगर मैं यहाँ से बाहर निकला, नदी मुझे निगल जाएगी...
यही है मेरी नियति: आज मुझे मरना ही है।
मगर नहीं, हरगिज नहीं, इच्छाशक्ति जीत सकती है सब कुछ
बाधाएँ हैं, मैं मानता हूं
मगर मैं बाहर नहीं आना चाहता, भागना नहीं चाहता
अगर मरना ही है मुझे, तो इसे यहीं, गुफा में हो जाने दो।
गोलियाँ, क्या कर सकती हैं गोलियाँ मेरा अगर
मेरी नियति डूबकर मरना है। मगर मैं
जीतने जा रहा हूँ अपनी नियति को। जीती जा सकती है नियति
इच्छाशक्ति से।
मौत, हाँ, मगर बिंधी हुई
गोलियों से, छिदी हुई बेनटों से, अगर ऐसा नहीं तो नहीं।
डूबकर, बिल्कुल नहीं...
वह याद जो मेरे नाम से ज्यादा जिन्दा रहेगी
संघर्ष करना है, संघर्ष करते हुए मरना है।

19 जनवरी 1949 को चे गेवारा की लिखी गयी एक कविता जो दादी की मृत्यु की याद में हैं...


"एक क्रांतिकारी, जिसे पढ़ते हुए मैंने जाना कि परिस्थितियों से गुजरकर होते हुए लड़ना कितना आनंदमय होता है।"

गुरुवार, 3 जनवरी 2019

सावित्रीबाई फुले : समाज सुधारक और भारत की पहली महिला शिक्षिका


आज महिलाओं का दिन हैं। आज ही के दिन सावित्रीबाई फुले का जन्म ( 3 जनवरी 1831) को महाराष्ट्र के पुणे में हुआ था। जिस समाज में घोर प्रितसत्ता और जातिवाद का ज़हर हो वह समाज कभी भी एक सभ्य और निर्णायक समाज नही हो सकता। अपने - अपने सिद्धांतों के जरिए ब्राम्हण वादी और ऊपरी जाति लोगों ने नीचे तबके के लोगों के लिए शिक्षा और अधिकारों से दूर रखकर उनपर छुवाछुत, भेदभाव जैसे कृत्य करवाए ताकि बहुलतावादी समाज में उनकी साख जमीं रहे। वह समाज कितना घटिया व लालची होगा जिसने अपने अंदर के स्वाभिमान के लिए तरह - तरह के शोषण, गैर-बराबरी और स्त्री विरोधी मान्यताओं जैसे प्रयोगों को उचित मानता रहा होगा।

 सावित्री बाई फुले ने स्वयं अपनी शिक्षा भी तमाम प्रकार के संघर्षों व प्रताड़नाओं के जरिए हासिल की थीं। इसीलिए वह चाहतीं थी कि कोई भी बालिका या बालक अपने शिक्षा को अपने जीवन में आगे रखें और समाज को एक नए पथ पर ले चले। सावित्रीबाई फुले जब स्कूलों में पढ़ाने के लिए जाती थी तो विरोधी लोग उनपर गंदगी फेंकते थे। आज से 160-165 साल पहले बालिकाओं के लिए स्कूल खोलना पाप का काम माना जाता था और कितनी मुश्किलों से खोला होगा उन्होंने देश में अकेला बालिका विद्यालय।

 सावित्रीबाई फुले पूरे देश की महानायिका हैं। उन्होंने हर धर्म व बिरादरी के लोगों के लिए काम किया हैं। जब वह बालिकाओं को पढ़ाने के लिए जाती थी तो लोग उनपर कीचड़, गोबर व अन्य विष्ट चीजें फेका करतें थे। इसीलिए वह अपने घर से 1 साड़ी अधिक लेकर चलती थी ताकि बच्चों को पढ़ाते समय फेंके गए पदार्थों की चीजें महक न आवे और वह स्कूल आकर गंदी हुई साड़ी को बदल लेती थीं।

"फुले दंपति ने 1848 में पुणे के भिड़ेवाड़ी में लड़कियों के लिए भारत में पहला स्कूल खोला। इसी स्कूल में अध्यापन का काम शुरू कर भारत की पहली महिला अध्यापिका होने का गौरव प्राप्त किया। फुले दंपति यह अच्छी तरह से जानते थे कि शिक्षा ही विकास के रास्ते खोल कर न्याय का मार्ग प्रशस्त कर सकती हैं।

सावित्रीबाई और जोतिबा ने शूद्रों - अतिशूद्रों के अलावा अल्पसंख्यक वर्ग के स्त्री पुरुषों की शिक्षा को जरूरी माना और फातिमा शेख जो उनकी ही स्कूल की छात्रा थी, उसे अपने स्कूल में अध्यापिका बनाकर देश की पहली मुसलमान अध्यापिका होने का गौरव प्रदान किया। फातिमा शेख फुले दंपति के आंदोलन की एक महत्वपूर्ण स्त्री नेतृत्व के रूप में जानी जाती हैं। परिवर्तन और सामाजिक न्याय में धर्मनिरपेक्ष सोच का होना शामिल जरूरी है तभी यह लड़ाई सफल होगी जब सभी धर्म और जाति की स्त्री शिक्षित होगी। सावित्री बाई फुले देश की पहली महिला शिक्षिका ही नहीं बल्कि उन्हें नारी मुक्ति आंदोलन का गौरव भी प्राप्त हैं।" यह लेख फारवर्ड प्रेस में छपा है जो सुजाता पारमिता ने लिखा हैं।

महिलाओं को समाज में उनका अधिकार मिलें और लड़कियों को उनके इच्छा अनुसार शिक्षा मिले। जो सपना आज से 100-150 साल पहले सावित्रीबाई फुले ने जो देखा था क्या अब वह पूरा होता दिखाई दे रहा है। नहीं। दिखाई दे रहा है। आज भी कई तरह के बंदिशें समाज, घर - परिवार, लोक-लाज चलन में है। इससे निकलकर ही हम एक अच्छे समाज का निर्माण कर सकतें है।

तमाम प्रकार की बातें हम खुद अपने घर - परिवार से सुनते आ रहें है कि ये मत करो, वे मत करो, यहाँ मत जाओ, वहाँ मत जाओ, उसके साथ मत घूमो, रात को मत निकलो, लड़कियों को बच के रहना चाहिये, लड़को से बात नही करना चाहिए। एक समय होते ही दहेज के साथ विदा कर दें ताकि समाज की उंगली हमारे पे मत उठे।

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