शनिवार, 6 अप्रैल 2019

जमीनी मुद्दों से गायब होता चुनाव!

                     ( यह कूड़ा मिलन विहार का है)
                      ( ये भी! मिलन विहार बुराड़ी में पड़ता है)
ये तीनो फ़ोटो दिल्ली के बुराड़ी क्षेत्र के मिलन विहार से ली गयीं हैं। स्लम बस्ती की फ़ोटो है जिसका "विकास" कही लापता हो गया है। अरविंद केजरीवाल कहते है कि हमने दिल्ली में विकास किया है लेकिन यहाँ तो नही दिख रहा है। क्या ये भी केंद्र सरकार के अंतर्गत आता है? दिल्ली में कचरा बहुत है जहाँ जाईये वहाँ कचरा ही कचरा है अधिकतम जगहों पर।

अब तो चुनाव आ गया है तो इसपर नेताजी का ध्यान कहाँ से जाएगा। अभी तो उनका पूरा ध्यान आईटी सेल और जोड़-घटाव,गठबंधन पे होगा। और असली मुद्दों पे चुनाव कौन लड़ता है जी। जो ये लड़ जाएं।

जब भी चुनाव की बात करतें है तो सबसे पहले यही ध्यान आता है कि हमारे गली-मोहल्ले-गाँव-शहर की खराब व्यवस्था( जैसे - स्कूल, अस्पताल, कॉलेज, बदबूदार नालियां, किसानों की समस्याएं, फसलों का मूल्य न मिलना, कचहरी में काम ठीक से होना, भ्रष्टाचार कम होना)। इत्यादि इन सभी बातों को लेकर नेता अपने- अपने रैलियों में इसका मुद्दा उठाएंगे और उनकी सरकार बनने पर इसका निदान जल्द से जल्द कर सकेंगे। लेकिन होता इसका उल्टा है।

 हमने पहले विकास शब्द का इस्तेमाल चुनावों में होता नही सुना या देखा। पहले इसको शिक्षा, पानी, बिजली,सड़क,गरीबी, अस्पताल और भी बहुत सारे हैं जिसको नेता बारी-बारी से गिनाते थे और कहते थे कि ये हटाओ, वो हटाओ और "गरीबी हटाओ"(जो हटा नही अब तक)। अब आप कहीं भी इन सब भागो को नही सुन सकते क्योंकि अब इन सबका समावेशीकरण "विकास" नामक वस्तु में हो गया है। अब हर जगह नेता विकास विकास का नारा बोलते रहते है और जनता से पूछते है कि बताईये विकास हुआ कि नही हुआ। बताईये न? 

शुक्रवार, 29 मार्च 2019

मोटर साइकिल!


उसकी जिद थी कि आखिरी बार आधी रात को आंखों में आँखे डालकर विदा लें। ताकि हमारे बाद, हमसे पहले या हो रहे मोहब्बत की परवान पर कोई शक़ न करें। उस रात मोटर साइकिल हवा में थी आँखों में बहता पानी था दिमाग भन्नाया था कलेजा धधक रहा था।

 आमतौर पर सवा-ग्यारह पर सोने वाला यह लड़का अपनी मोहब्बत से मिलने स्टेशन जा रहा था। उसे फ्रूटी और आइस क्रीम गोपाल चचा की दुकान की बहुत पसंद थी। जो छूट गया अब। जो नही छूटा वह उसका नीला वाला कुर्ता था जो कटरा में खरीदा था डिस्काउंट पर। रात 1:20 की ट्रेन थी। मोटर साइकिल हवा में थी। उससे मिलने की बेचैनी बढ़ रही थी। 

कई दिन पहले कंपनी बाग के घास पर बैठे -बैठे उसके हाथों को अपने हाथों में लेते हुए केदारनाथ सिंह जी एक पंक्ति कही थी। 

"उसका हाथ
अपने हाथ में
लेते हुए मैंने सोचा
दुनिया को 
हाथ की तरह गर्म
और सुंदर होना चाहिए।"

वाह! तुमने लिखी है क्या?
नहीं... केदारनाथ सिंह जी की हैं। 
देख लेना यही हाथ हम लोगों का सदा के लिए जुड़ जाएगा। 

शहर - इलाहाबाद 

शुक्रवार, 1 फ़रवरी 2019

गांधी के नाम पत्र!

मान्यवर महात्मा

  'किस्सा सुनते हो रोज औरों के
  आज मेरी भी दास्तान सुनो'


 " आपने उस अनहोनी को प्रत्क्षय का कार्यरूप में परिणत कर दिखाया, जिसे टॉल्सटाय और महात्मा केवल विचारा करतें थे। उसी आशा और विश्वास के वशीभूत होकर हम आपके निकट अपनी राम कहानी सुनाने के लिए तैयार हैं। हमारी दुःख भरी कहानी दक्षिण अफ्रीका के अत्याचार से, जो आप और आपके अनुयायी वरी सत्याग्रही बहनों और भाइयों के साथ हुआ, कहीं अधिक है। हम अपना वह दुःख जो हमारी 19 लाख आत्माओं के हृदय पर बीत रहा है, सुनाकर आपके कोमल हृदय को दुखित करना उचित नहीं समझते हैं। बस केवल इतनी ही प्रार्थना है कि आप स्वयं आकर अपनी आँखों से देख लीजिए, तब आपको अच्छी तरह विश्वास हो जाएगा कि भारतवर्ष के एक कोने में यहाँ की प्रजा, जिसको ब्रिटिश छत्र की सुशीतल छाया में रहने का अभिमान प्राप्त है, किस प्रकार के कष्ट सहकर पशुवत जीवन व्यतीत कर रही है। हम और अधिक न लिखकर आपका ध्यान उस प्रतिज्ञा की ओर आकृष्ट करना चाहतें हैं, जो लखनऊ कांग्रेस के समय और फिर वहाँ से लौटते समय कानपुर में आपने की थी, अर्थात मार्च - अप्रैल महीने में चंपारण आऊँगा, बस अब समय आ गया है। श्रीमान अपनी प्रतिज्ञा को पूर्ण करें। चम्पारण की 19 लाख दुःखी प्रजा श्रीमान के चरण - कमल के दर्शन की टकटकी लगाए बैठी है। और उन्हें आशा ही नहीं पूर्ण विश्वास है कि जिस प्रकार भगवान श्री रामचन्द्र के चरण स्पर्श से अहिल्या तर गई, उसी प्रकार श्रीमान के चम्पारण में पैर रखते ही हम 19 लाख प्रजाओं का उद्धार हो जाएगा।"

बेतिया।                                       श्रीमान का दर्शनाभिलाषी
27 फरवरी, 1917                         राजकुमार शुक्ल


  यह वही पत्र था जिसे पढ़कर एमके गांधी ने चम्पारण जाने की अपनी योजना को तठस्थ और सुदृढ़ बना लिया। यह पत्र तो राजकुमार शुक्ल के नाम से लिखा गया था लेकिन यह पत्र "प्रताप" अखबार के पत्रकार पीर मोहम्मद मुनीस ने लिखा था। राजकुमार शुक्ल उतने पढ़े - लिखें नहीं थे जो एमके गांधी को इतना मार्मिक और आने के लिए विवश कर सकें। 

  और जब गांधी चम्पारण पहुँचे तो नील का दाग मिट गया। और यह हम सब जानते है। और यह साल तो गांधी की 150वीं जयंती है अक्टूबर 2 को। 

बुधवार, 23 जनवरी 2019

पाब्लो नेरुदा - आज तो आज है और बीता कल बीत गया, यह तय है।

                  उत्सव


आज तो आज है, कल आ पहुँचा है
न जाने कितने - कैसे अंधेरों से बना:
हमें नहीं मालूम
इस नयी जन्मी दुनिया में उजाला है भी या नहीं:
आओ इसे आँच दें, इसे ठंड दें,
जब तक कि यह सुनहरी और भूरी न हो जाए
अनाज के पके कठोर दानों की तरह:
कि हर कोई, नवजात, त्रासदियों से बचे लोग,
           अंधे, मूक-बधिर, विकलांग, लुटे-पिटे, सभी,

देख सकें और कह सकें
कि वे जी सकतें हैं आजाद घूम सकतें हैं,
कि वे चख सकतें हैं, रख सकते हैं भविष्य के फल,
जो उस वर्तमान साम्रज्य में उपजेंगे जिसमें हमने
अन्वेषी को भी वही अधिकार दिया है जो महारानी को,
जिज्ञासु खगोली को भी उतना ही जितना पुरातन खेतिहर को,
उन मधुबालाओं को भी जो छत्ता बनाने के काम में जुटी हैं
और सबसे बढ़कर उनको जो भी अभी-अभी आए हैं,
वे लोग जो बढ़ते ही जाएंगे
नयी ध्वजाओं के साथ, जो जन्मी थीं लहू और पसीने की हर बूंद से
आज तो आज है और बीता कल बीत गया, यह तय है।
आज आने वाला कल भी है, और किसी गुजरे ठंडे साल के साथ
मैंने महसूस किया वह साल जो मेरे साथ छूट गया
और मैंने अपने साथ लेता गया।
इस बारे में कोई संशय नहीं। अक्सर मेरा कंकाल
हवा और बरसात झेलती वज्र हुई हड्डियों जैसे शब्दों से बनता है
और मैं वर्तमान का उत्सव मनाता हूँ अपने पीछे
किसी गीत या गवाही के बजाय,
शब्दों का एक हठीला, टिकाऊ कंकाल छोड़कर।

गुरुवार, 17 जनवरी 2019

चे गेवारा और चाय!


मैं जानता हूँ। जानता हूँ मैं!
अगर मैं यहाँ से बाहर निकला, नदी मुझे निगल जाएगी...
यही है मेरी नियति: आज मुझे मरना ही है।
मगर नहीं, हरगिज नहीं, इच्छाशक्ति जीत सकती है सब कुछ
बाधाएँ हैं, मैं मानता हूं
मगर मैं बाहर नहीं आना चाहता, भागना नहीं चाहता
अगर मरना ही है मुझे, तो इसे यहीं, गुफा में हो जाने दो।
गोलियाँ, क्या कर सकती हैं गोलियाँ मेरा अगर
मेरी नियति डूबकर मरना है। मगर मैं
जीतने जा रहा हूँ अपनी नियति को। जीती जा सकती है नियति
इच्छाशक्ति से।
मौत, हाँ, मगर बिंधी हुई
गोलियों से, छिदी हुई बेनटों से, अगर ऐसा नहीं तो नहीं।
डूबकर, बिल्कुल नहीं...
वह याद जो मेरे नाम से ज्यादा जिन्दा रहेगी
संघर्ष करना है, संघर्ष करते हुए मरना है।

19 जनवरी 1949 को चे गेवारा की लिखी गयी एक कविता जो दादी की मृत्यु की याद में हैं...


"एक क्रांतिकारी, जिसे पढ़ते हुए मैंने जाना कि परिस्थितियों से गुजरकर होते हुए लड़ना कितना आनंदमय होता है।"

गुरुवार, 3 जनवरी 2019

सावित्रीबाई फुले : समाज सुधारक और भारत की पहली महिला शिक्षिका


आज महिलाओं का दिन हैं। आज ही के दिन सावित्रीबाई फुले का जन्म ( 3 जनवरी 1831) को महाराष्ट्र के पुणे में हुआ था। जिस समाज में घोर प्रितसत्ता और जातिवाद का ज़हर हो वह समाज कभी भी एक सभ्य और निर्णायक समाज नही हो सकता। अपने - अपने सिद्धांतों के जरिए ब्राम्हण वादी और ऊपरी जाति लोगों ने नीचे तबके के लोगों के लिए शिक्षा और अधिकारों से दूर रखकर उनपर छुवाछुत, भेदभाव जैसे कृत्य करवाए ताकि बहुलतावादी समाज में उनकी साख जमीं रहे। वह समाज कितना घटिया व लालची होगा जिसने अपने अंदर के स्वाभिमान के लिए तरह - तरह के शोषण, गैर-बराबरी और स्त्री विरोधी मान्यताओं जैसे प्रयोगों को उचित मानता रहा होगा।

 सावित्री बाई फुले ने स्वयं अपनी शिक्षा भी तमाम प्रकार के संघर्षों व प्रताड़नाओं के जरिए हासिल की थीं। इसीलिए वह चाहतीं थी कि कोई भी बालिका या बालक अपने शिक्षा को अपने जीवन में आगे रखें और समाज को एक नए पथ पर ले चले। सावित्रीबाई फुले जब स्कूलों में पढ़ाने के लिए जाती थी तो विरोधी लोग उनपर गंदगी फेंकते थे। आज से 160-165 साल पहले बालिकाओं के लिए स्कूल खोलना पाप का काम माना जाता था और कितनी मुश्किलों से खोला होगा उन्होंने देश में अकेला बालिका विद्यालय।

 सावित्रीबाई फुले पूरे देश की महानायिका हैं। उन्होंने हर धर्म व बिरादरी के लोगों के लिए काम किया हैं। जब वह बालिकाओं को पढ़ाने के लिए जाती थी तो लोग उनपर कीचड़, गोबर व अन्य विष्ट चीजें फेका करतें थे। इसीलिए वह अपने घर से 1 साड़ी अधिक लेकर चलती थी ताकि बच्चों को पढ़ाते समय फेंके गए पदार्थों की चीजें महक न आवे और वह स्कूल आकर गंदी हुई साड़ी को बदल लेती थीं।

"फुले दंपति ने 1848 में पुणे के भिड़ेवाड़ी में लड़कियों के लिए भारत में पहला स्कूल खोला। इसी स्कूल में अध्यापन का काम शुरू कर भारत की पहली महिला अध्यापिका होने का गौरव प्राप्त किया। फुले दंपति यह अच्छी तरह से जानते थे कि शिक्षा ही विकास के रास्ते खोल कर न्याय का मार्ग प्रशस्त कर सकती हैं।

सावित्रीबाई और जोतिबा ने शूद्रों - अतिशूद्रों के अलावा अल्पसंख्यक वर्ग के स्त्री पुरुषों की शिक्षा को जरूरी माना और फातिमा शेख जो उनकी ही स्कूल की छात्रा थी, उसे अपने स्कूल में अध्यापिका बनाकर देश की पहली मुसलमान अध्यापिका होने का गौरव प्रदान किया। फातिमा शेख फुले दंपति के आंदोलन की एक महत्वपूर्ण स्त्री नेतृत्व के रूप में जानी जाती हैं। परिवर्तन और सामाजिक न्याय में धर्मनिरपेक्ष सोच का होना शामिल जरूरी है तभी यह लड़ाई सफल होगी जब सभी धर्म और जाति की स्त्री शिक्षित होगी। सावित्री बाई फुले देश की पहली महिला शिक्षिका ही नहीं बल्कि उन्हें नारी मुक्ति आंदोलन का गौरव भी प्राप्त हैं।" यह लेख फारवर्ड प्रेस में छपा है जो सुजाता पारमिता ने लिखा हैं।

महिलाओं को समाज में उनका अधिकार मिलें और लड़कियों को उनके इच्छा अनुसार शिक्षा मिले। जो सपना आज से 100-150 साल पहले सावित्रीबाई फुले ने जो देखा था क्या अब वह पूरा होता दिखाई दे रहा है। नहीं। दिखाई दे रहा है। आज भी कई तरह के बंदिशें समाज, घर - परिवार, लोक-लाज चलन में है। इससे निकलकर ही हम एक अच्छे समाज का निर्माण कर सकतें है।

तमाम प्रकार की बातें हम खुद अपने घर - परिवार से सुनते आ रहें है कि ये मत करो, वे मत करो, यहाँ मत जाओ, वहाँ मत जाओ, उसके साथ मत घूमो, रात को मत निकलो, लड़कियों को बच के रहना चाहिये, लड़को से बात नही करना चाहिए। एक समय होते ही दहेज के साथ विदा कर दें ताकि समाज की उंगली हमारे पे मत उठे।

रविवार, 23 दिसंबर 2018

एक किसान, लेखक व पत्रकार की कहानी

                      ( तस्वीर - इनके फ़ेसबुक वॉल से)

बिहार के पूर्णिया जिले के चनका गाँव के रहने वाले गिरिन्द्रनाथ झा वर्तमान समय में किसान, लेखक व ब्लॉगर हैं। ये बेहद ही मृदभाषी व सरल इंसान हैं। अपने ब्लॉग "अनुभव" पर देश-दुनिया व गाँव की बातें बड़ी सहजता, प्रखरता व साफगोई से उठाते हैं। आप इनके ब्लॉग पर जाकर इसका अनुभव भी कर सकते हैं कि कैसे नए-नए शब्दों के कलात्मक से रचनाएँ लिखतें रहतें हैं। और फ़ेसबुक पर भी गाँव - घर व समाज की बात लिखते रहतें हैं।

 गिरिन्द्रनाथ झा की पढ़ाई बचपन से ही विभिन्न शहरों में हुई और अपना ग्रेजुएशन दिल्ली यूनिवर्सिटी के सत्यवती कॉलेज से अर्थशास्त्र में किया और फिर वाईएमसीए इंस्टीट्यूट से प्रिंट मीडिया में पोस्ट ग्रेजुएशन। इसके बाद आईएनए न्यूज़ पत्रिका से जुड़ गए। इसी के साथ सीएसडीएस-सराय की फेलोशिप से प्रवासी इलाकों में टेलीफोन बूथ पर रिसर्च किया। देश के बड़े- बड़े संस्थानों में काम किया।

 हालांकि गिरिन्द्रनाथ झा का मन काम करते हुए गाँव में ही बसता रहता था। इसलिए सन 2006 से ही जब भी वे गाँव जाते तो वहाँ कुछ न कुछ कदंब के पेड़ जरूर लगा आते। उनके दिमाग में गाँव में एक ऐसा घर बनाने का सपना पनपने लगा जहाँ शहरों के लोग भी आकर रहने को उत्सुक हो। हर छुट्टी पर गाँव आकर पेड़ लगाने का सिलसिला यूँही चलता रहा पर गिरिन्द्रनाथ झा अपने बाबूजी के आगे गाँव में ही बस जाने की बात का उल्लेख नही कर पाए। पर नियति को कुछ और ही मंजूर था। सन 2012 में जब गिरिन्द्रनाथ झा अपने पत्रकारिता के शिखर पर थे तो अचानक एक दिन उनके बाबूजी को ब्रेन हैमरेज होने की खबर आई। और वें सब कुछ छोड़कर कानपुर से चनका चले गए। और अपने बाबूजी की सेवा में लग गए और साथ ही साथ अपने 17 बीघा पुस्तैनी जमीन पर खेती करने लगें।

 गिरिन्द्रनाथ झा कहतें हैं कि " मुझे बचपन से ही लिखने का शौक रहा है और गाँव आपको कई रोचक कहानियां देता है। यूँ कह लीजिए कि एक लेखक के लिए गाँव में ढेर सारा रॉ मैटेरियल उपलब्ध होता है। ऊपर से गाँव का होते हुए भी मुझे गाँव में रहने का मौका ही नहीं मिला। शायद यही वो कारण था जिसकी वजह से गाँव हमेशा मुझे अपनी ओर खींचता था।"

  राजकमल प्रकाशन की लघु प्रेम कथा "लप्रेक" श्रृंखला की तीसरी किताब "इश्क़ में माटी सोना" इन्होंने ही लिखी हैं।
    " ......और आज जब उसी शाम ने
          फिर से दस्तक दे ही दी है तो एक बात कहूँ....
        मैंने आज मौसम- भर का वसन्त तुम्हारे नाम कर दिया हैं!
      सुबह की डाक का इंतजार करना...
      बस, कबूल कर लेना..."
                           
लप्रेक श्रृंखला के जरिए बहुत सारें लोगों ने इनके लिखें हुए रचना को ढेर सारा प्यार दिया। गिरिन्द्रनाथ झा गाँव के बारें में कहतें हैं कि " अक्सर गाँव की छवि एक दुःखदायी जगह की होती है, जहाँ गरीबी है, भुखमरी है, कीचड़ है और सिर्फ असुविधाएं है। पर दुख कहाँ नहीं होता? आपको शहरों में जब नौकरी में इंसेंटिव नहीं मिलता तब दुःख नही होता? बस गाँव भी वैसा ही है; यहाँ दुःख तो है पर शान्ति भी है, सुख भी है, और माटी की खुश्बू का मज़ा भी है। मैं शहर की गाँव के प्रति इसी मानसिकता को बदलना चाहता हूँ।"   
  
  अपने ब्लॉग " अनुभव" पर हमेशा लिखते रहने के कारण साल 2015 में एबीपी न्यूज़ और दिल्ली सरकार की ओर से इन्हें सर्वश्रेष्ठ हिंदी ब्लॉग का सम्मान भी मिल चुका है। इसके अलावा राजनीतिक व सामाजिक विषयों पर एनडीटीवी, बीबीसी, दैनिक व हिंदुस्तान जैसी कई अखबारों और न्यूज़ बेबसाइट के लिए लिखते रहतें हैं। इसके साथ - साथ बाहरी दुनिया से खुद व अपने गाँव चनका को भी जोड़े रखतें हैं।


 गिरिन्द्रनाथ झा अपने गाँव चनका रेसीडेंसी को फेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और अन्य न्यूज़ वेबसाइटों पर ला चुकें है इसके लिए वह अपने यहाँ कई तरह के कार्यक्रम आयोजित करतें रहतें है ताकि लोगों का नजरिया गाँवो के प्रति बदल सकें और गाँवो की समस्याओं को ख़त्म करने की पहल की जा सकें।

    गिरिन्द्रनाथ झा फणीश्वरनाथ 'रेणु' के लिखें गए साहित्यिक उपन्यास जैसे- मैला आँचल और परती परिकथा में लिखीं गयीं बाते अपने फ़ेसबुक पेज और ब्लॉग पर लिखतें रहतें हैं। जिससे उनका 'रेणु' के प्रति प्यार व झुकाव दिखता हैं। और पूर्णिया के बारे फणीश्वरनाथ "रेणु" का लिखा गया यह 'कोट' बहुत ही प्रसिद्ध है - 

  " आवरण देबे पटुआ, पेट भरन देबे धान,
      पूर्णिया के बसैया, रहे चदरवा तान।"    

गिरिन्द्रनाथ झा कहतें हैं  "अगर धान मेरे लिए बेटी है तो मक्का मेरे लिए बेटा, जो मुझे साल भर का राशन पानी देता है। लेकिन याद रखियेगा रोटी के लिए गेहूं, चावल के लिए धान और मल्टीप्लेक्स में आपके पॉपकॉर्न के लिए मक्का हम सभी उपजाते हैं। अगर एक आँधी-पानी-सूखा हमें बर्बाद कर सकता है तो याद रखिये एक अच्छा मानसून हमें बम्पर फ़सल भी देगा।" यह मार्मिक शब्द कई हमारे जैसे लोगों के लिए हौसलाअफ़जाई का काम करता है। 



  

गुरुवार, 12 जुलाई 2018

           ~ अधूरी यात्राएं...पार्ट टू ~


अगर ओपी सर का क्लास न होता तो उसके पानी पीने वाले कार्यक्रम में मैं भी सम्मलित हो जाता और लड़के लड़कियों को ओवरटेक करके एक बार अपनी उपस्थिति उसके आँखों मे दर्ज करवा ही देता। यह अलग बात है कि मैं उससे कुछ कह न सका। ओपी सर! कई बड़े - बड़े फेंकने वाले लौंडो को एक झापड़ में डेस्क के नीचे पहुँचाते जहाँ वह च्युंगम चिपकाते थे।सेक्शन अलग होने के कारण न मुझे वह भाव देती और न मेरे क्लास में बीच मांग फार के आने वाले सलमान खानों को। तमाम काली माई, देई माई और बरम बाबा से अपनी गुहार लगाई, लेकिन बार - बार कॉल ड्राप वाली समस्या यहाँ भी उत्पन्न हो जाती। एक बार मन्नत पूर्ण होने के लिए बताशा के रूप में प्रसाद भी चढ़ाया। उसको स्कूल के बेर बहुत पसंद थे जो उसकी लम्बी वाली दोस्त प्रतिदिन छत से सटे बेर को तोड़ लाती। उनका तीन लोगों का गैंग था और हम लोगों का ढाई।  एक बार इसी देशव्यापी कार्यक्रम के लिए प्रिंसीपल ऑफिस में हाजिरी लगवानी पड़ी। अगर अनिमेश को झूठा बेर आगे वाले लौंडो के बैग में रखने का शौक न होता और चलती - फिरती क्लास में लड़कों को कॉपी देने के लिए न मरता तो प्रिंसिपल आफिस में उससे मुलाकात न होती। आफिस में उसकी गैंग जैसे ही दस्तक दी की मेरी आँखें फट के बाहर आने लगी। उन लोगों के दस्तक से हम लोगों में हलचल होने लगी, तभी नाटे सर ने पूरी बात महाभारत कथा की तरह बताई। तब जाकर अंदर की खुशी बाहर ला सकें। मेरी निगाहें उसपर पड़ती और उसकी कहीं और! प्रिंसिपल ऐसे कुर्सी पर आराम फरमाते जैसे बड़ा भारी काम करके आये हो। 

      अगर उस दिन संविधान में आत्महत्या करना मौलिक अधिकार होता तो उसी समय उसके बालों को अपने गले में फसाकर जान दे देता। उसके सामने पीठ पर दो मुक्के, हाथों पर चार डंडे उपहार स्वरूप मिलें। और मुझे चीड़ इस बात पर हुई कि प्रतिदिन बेर तोड़ने वालियों को बस डांट कर भगा दिया गया।( कम से कम अगर महिला मास्टर न हो तो पुरुष प्रधान देश के पुरुष मास्टर दो डंडे मार ही देते। महिला हो तो लड़को के बराबर।) यह माहौल ही देशभर में एक बड़ा आंदोलन खड़ा करने के लिए काफी था। मार खाने के बाद प्यास जल्दी लग जाती है उस दिन पता चला। हाथों की गरमाहट को पानी से ठंडा कर रहे थे। तभी वह लोग भी आई। ज्यादे चोट तो नही आयीं - उसने कहाँ
नही - मैंने कहाँ 
पहली बार बस इतनी ही बात हुई। उसके अगले दिन वह पांचवी क्लास के समय पिछले दरवाजे के पास आकर खड़ी हो गयी। न कुछ बोलती और न ही कुछ इशारा करती। मेरी हिम्मत इतनी नही थी कि प्रिंसिपल क्लास को छोड़कर( और वो भी जो कल हमको मारा था) बाहर आ जाते और पानी पीने के बहाने उसके पीछे - पीछे बात करते करते चले जाते।
   शायद उसको उस दिन मेरा निकम्मेपन और बहादुरी का पता चल गया था। जो सपनों में मुझे बड़ा तीस मार ख़ाँ समझती थी। उसमें उसकी गलती नही थी अगर उस दिन उन लड़कियों को भी मार पड़ती तब उसे भी डर का पता चलता।

   किस्मत भी उस रेत की तरह है जो जल्दी चाहत के चक्कर मे मुट्टी तो तेज दब जाती, लेकिन रेत उससे और तेज फिसल जाती। 

गुरुवार, 5 जुलाई 2018

                        ~ अधूरी यात्राएं ~ 


भोरहरी में डकनिया तालाब स्टेशन के रेलवे लाइन के पास बैठकर शौचालय करने में बड़ा आंनद देता। जब राजधानी दस - बारह मीटर दूर से सिटी बजाते हुए निकलती और पाछा सुन्न हो जाता। हाई स्कूल पास करने के बाद उससे पहला प्यार हुआ था। नही दूसरा था। छोटे शहरों का प्यार आप से नही तुम से हुआ करता था। यह उसने बताया। उन दिनों एक ऐसी अफवाहें उड़ा करती थी कि जो स्कूल का सबसे खतरनाक मास्टर हो, जो स्कूल में कहीं से भी गुजर जाए तो लौंडो में हलचल हो जाती, किसी के हवाओं में बाल नीचे बैठ जाते तो किसी के कान का पर्दा दर्द करने लगता। स्कूल की दीवारों से बात सुनकर मैंने भी ट्यूशन जॉइन कर लिया। पहली बार उससे वही मुलाकात हुई थी। शायद यह कथन सत्य ही था कि अगर आप उस मास्टर से ट्यूशन लेते है तो वह कम मारता है चाहे गलती आपकी ही क्यों न हो। उन दिनों ट्यूशन फीस चार सौ पचास रुपये हुआ करती थी। स्कूल की हवाईबाजी के लिए ट्यूशन में हाथों पर फुला देने वाले प्रसाद खाने को मिलें। मुझे यह उपहार ही मिला था। उसने उसको खूब गरियाया और अपनों होंठो से मेरे हाथ चूमने लगीं। 

    उसको सिगरा पे घूमना अच्छा लगता था, और मुझें भी। दिन ऐसे ढलता जैसे सिनेमा हॉल में उसके साथ  बैठकर पिक्चर देखते - देखते मेरा हाथ उसकी साइड के गर्दन तक पहुँचते ही पिक्चर ख़त्म होने लगती, लेकिन उसका किस अभी भी बाक़ी रह जाता। उसे चॉकलेट बहुत पसंद थे और मुझे वे। मुझे नही पता कि साप्ताहिक एतवार किसने बनाया होगा, उन दिनों रामपुरी चाकू साथ लिए घूमता था। और जाहिर सी बात है बनाने वालों को स्कूली प्यार हुआ भी नही होगा। यह दिन आम जेलों की तरह न होके तिहाड़ जेल में बदल जाता और माता - पिता इसके सीसीटीवी बन जाते। उसके प्यार में हाई स्कूल पास होना जैसे मानो देश कि सबसे बड़ी परीक्षा पास कर लिया हो और उसने विदेश की। उसके जाने के दो साल बाद इंटर में हाई स्कूल से कम नंबर आया लेकिन यूपी ट्रिपल आईटी में डेढ़ हजार वीं रैंक थी। उन दिनों में भूखहड़ताल करके ढेर सारा पैसा इकट्ठा कर लिया था जो उसके जन्मदिन में गिफ्ट देने के चक्कर में हाथ धोना पड़ा। कई दिन तक रात में नींद भी नही आती थी। शायद उस दिन मुझे लंबा राष्ट्रीय किस भी मिला था। 

      उसके जाने के बाद कितनों की सिगरेट का धुँवा हवाओं में सम्मिलित कर दिया। मेरा मिथक टूट गया और पहला प्यार पाने के लिए वह तमाम मैसेज, दोस्तो से अपनी फरयादी भेजवाई और खुद कितनी बार मिलने की कोशिश की लेकिन उसने कभी भी आँख न मिलाई। क्या वह मुझसे इतना नाराज थी। अगर मुझमें भी कोई सुपरपॉवर होता तो उस समय मे जाकर उस हड़बड़ाई और झुनझुनाहट वाली गलती को मार डालता जिसको आज न झेलता पड़ता। हमारे समाज में प्यार करने वालो को सबसे नीच समझा जाता है। यही से हमारी अधूरी यात्राएं शुरू हो जाती है।


......... डकनिया तालाब स्टेशन कोटा में पड़ता है और सिगरा बनारस में। 

बुधवार, 4 जुलाई 2018

                      ~ कमरों का किराया ~



 बारह सौ रुपये कमरें का किराया था। जिसका आधा दरवाजा टूटा हुआ, खिड़की पे हिन्दी अखबार ऐसे पसरे थे मानो धन्नो के लिए यही बेस्ट जगह हो। उस दिन पता चला कि हिंदी अखबारों के पाठक किस और किन हालतों में पढ़ते है जिसमें सिर्फ मसाला ही रहता है। कमरें का भूगोलिकरण करते -करते अपने गाँव का भूसा वाला घर याद आ गया जिसमें भूसा को छोड़कर झाले, कीट - फतिंगे और छोटे - मोटे पल पोसुवे जानवर रहा करते थे। यह कमरा बिल्कुल उसी तरह था। इलाहाबाद में कमरों का एक अपना इतिहास है। पता नही अब तक साहित्य वालों ने गाँव देहात से आए लड़को को Transforming India कहकर कोई ज्ञानपीठ क्यों नही लें लेता। वहाँ तो कहावत भी हैं ' यहाँ भगवान को ढूढ़ना आसान है रूम को नही'। 

          
      वह दिन भी बहुत अजीब थे सात बजे की एकाउंट की क्लास लेने के चक्कर में कोचिंग जल्दी पहुँच जाता और बिना स्वाद के चाय पीने लगता। इसी उम्मीद में कि सबसे पहला नजर मेरा ही पड़े। उस दिन नारंगी बैंगल और कुर्ता था जो उसके हल्के नीले - काले लेंगिस से मिलता जुलता था। उसके आते ही लौंडे ने ठफरी चालू कर दी, लेकिन वह खिसियानी बिल्ली की तरह अंदर चली गयी ( अगर उसे खिसियानी बिल्ली का पता चल जाता तो उसके स्कूटी पर पीछे बैठकर उसके नाभि तक हाथ न पहुँचता और खुद चलाते समय धड़ाधड़ ब्रेक न मारने को मिलता)। वह हर रोज मैचिंग के ड्रेस पहन - पहन कर आती। पता नही कपड़े उसे अच्छे लगते या कपड़ों ने उसे पसंद कर लिया।  एक दिन ऐसे ही कॉफी हाउस में मैंने उसको टोक ही दिया। उसने बातों को ऐसे ध्यान न दिया हो जैसे कोई मंत्री गरीब किसान व मजदूर की बात न समझता हो। यहाँ उसके लिए गरीब यानी पेमेंट बैंकर मैं ही था। वहीं टूटे हुए दरवाजे के पास दो तखत पर रोटी सब्जी खाकर दिनभर की बातें आशु भईया को सब बताता और फिर सो जाता। 


      उस साझ को मैंने जिन्दगी भर दो बातों के लिए पछताया - पहला की वह हमेशा के लिए जा रही थी और मैंने उसे हमेशा की तरह गले लगाकर माथे पर न चूमा और दूसरा अपने जिगरी यार के मरने पर ना जा सका। उसी लॉज में रहते - रहते कई साल हो गए थे। दीवारों से अब अपनापन और मोह सा लगने लगा था। उस लॉज ने अपना एक परिवार दिया जहाँ भी जरूरत हुई सबने बिना डर के सबका साथ दिया।  मैं वह रात आजतक नही भूल पाया हूँ जिसमें एक बूढ़ी औरत के लिए बड़े भईया ने दुकानदार से लड़ाई कर लिया था। बात दरबदर बढ़ने लगी और दुकानदार जोश में होश खोकर राइफल निकाल कर भईया के सामने तान दिया। बातों की बहसाबहसी में राइफल की गोली निकल गयीं और सामने की दीवार पर जाकर धस गयी। लड़ाईयां अब भयंकर शुरू हो गयी। पूरे मार्किट में हल्ला हो गया कि लॉज के लड़कों ने लोकलों से लड़ाई कर लिया। इसी बीच में एक सहपाठी की हाथ टूट गयीं लेकिन हमने उनको खदेड़ ही दिया। थाना अस्पताल और चौकी एक करके उनपे कई धारा लगवाया गया (लॉ किये हुए लड़के किस दिन काम आते)। 

  
     यहाँ सवा ग्राम वाला लेखक यह जानना चाहता है कि आखिर क्यों लोग 'कमरों में रहकर एक खुद का कमरा' बना लेते। यह आजादी उसे बिना किसी परछाई के मिली। जो उसे आज यहाँ लिखने पर मजबूर कर दिया। 
     


मंगलवार, 3 जुलाई 2018

खेत खलिहान

                          खेत खलिहान 



कुछ दिनों बाद खेतों में अब धान की रोपनी शुरू होने वाली है जिसके लिए किसान अब अपने - अपने खेतों में पानी का लेव लगा रहे होंगे ताकि धान का बिया खेत मे अच्छे से गड़ सके। जिन राज्यों में मानसून अच्छी हुई होगी, वहाँ के किसानों के लिए राहत होंगी और वे बिना भागदौड़ के अपने - अपने खेतों की अच्छी तरह से सिंचाई कर सकेंगे। कई जगह खेतों में पानी ट्यूबल या नहरों से भी पहुचाये जाते है और कई ऐसे भी जगहें है जहाँ डीजल लगे मोटर से पानी की सिंचाई होती है( एक ये भी कारण है कि किसानी इतनी महंगी हो जाती हैं)। इसमें अकूत मेहनत लगी रहती है किसानी के लिए चिलचिलाती धूप हो या जाड़े की हाड़ गलाने वाली ठंडी या बिजली गिरती हुई बारिश हो सबमें खड़े होकर अपने फसल को देखना सबसे मुश्किल रहता है।

     जब भी बाढ़ या बिन मौसम बारिश से अपने उगे हुए फसलों को धरती पर गिरा देखते है सीने की आग दहल उठती है। हमने लहलहाती फसलों को गिरते देखा, जो फसल कट गई उसको सड़ते देखा। खेती - किसानी करते हुए लोगों ने धान को अपनी बेटी और मक्का को अपना बेटा मान लिया है। इसी उम्मीद में कि अगली बार फिर से नए अंदाज में इठलाती, बलखाती फसलों का नया शेप पैदा करूँगा। 

   सरकारों ने इनका हक़ मारने लिए अपना वजीफा बड़ा कर लिया। बिना किसान और गरीब की बात किये आजतक कोई नेता नही बन सके, लेकिन उनकी बातें आजतक न सुनी गयीं। 

सूखते कपड़ो का छत!

छतों पर सूखते कपड़ो को देखकर ऐसा लगता है जैसे छत बनाये ही इसीलिए जाते हैं ताकि छतों पर कपड़े सुखाए जा सकें। जाड़ा के मौसम में तो भारत के लगभग स...